UP Politics 30 May : पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में शानदार प्रदर्शन से उत्साहित भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अब देश के सबसे बड़े राजनीतिक सूबे उत्तर प्रदेश में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। साल 2027 में होने वाले यूपी विधानसभा चुनावों के लिए भाजपा ने अभी से बिसात बिछानी शुरू कर दी है। //आप पढ़ रहे हैं द खटिया खड़ी न्यूज// हालिया योगी आदित्यनाथ कैबिनेट का विस्तार और बूथ स्तर पर संगठन को मथने की कवायद इसी बड़ी रणनीति का हिस्सा है।
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भाजपा का लक्ष्य 2027 में जीत की ‘हैट्रिक’ लगाना है, लेकिन इस राह में एक बड़ा रोड़ा है—61 ऐसी विधानसभा सीटें, जो पिछले 15 सालों से भाजपा के लिए एक अभेद्य किला बनी हुई हैं। इन सीटों के सियासी गणित को सुलझाने के लिए पार्टी ने एक ‘महामंथन’ शुरू किया है।
61 सीटों का ‘नासूर’ और प्रदेश अध्यक्ष की दो टूक
उत्तर प्रदेश की कुल 403 विधानसभा सीटों में से 61 सीटें ऐसी हैं, जहाँ 2012, 2017 और 2022 के लगातार तीन विधानसभा चुनावों में भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा है।//आप पढ़ रहे हैं द खटिया खड़ी न्यूज// मोदी लहर (2017) और योगी की सत्ता विरोधी लहर को मात देने वाली (2022) हवाओं के बावजूद इन सीटों पर कमल नहीं खिल सका।
पार्टी सूत्रों के मुताबिक, यूपी भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने पार्टी के शीर्ष नेताओं और रणनीतिकारों को दो टूक निर्देश दिए हैं:
“चुनावी अभियान के शुरुआती चरण में सारा ध्यान और प्राथमिकता इन्हीं 61 मुश्किल सीटों पर केंद्रित की जाए। जो कसर पहले रह गई थी, उसे इस बार हर हाल में पूरा करना है।”
जमीन पर तैयारी: बूथ स्तर का डेटा और ‘माइक्रो-मैनेजमेंट’
भाजपा इन सीटों पर पारंपरिक चुनावी रैलियों के भरोसे नहीं है। पार्टी ने इन 61 निर्वाचन क्षेत्रों के लिए एक विशेष ‘माइक्रो-रोडमैप’ तैयार किया है:
📍डेटा संकलन: बूथ-स्तर से विस्तृत चुनावी डेटा और फीडबैक इकट्ठा किया जा रहा है।📍जातीय समीकरण: हर सीट की अनूठी जातीय संरचना का बारीकी से विश्लेषण किया जा रहा है।📍स्थानीय मुद्दे: उन कारणों की पहचान की जा रही है जिनकी वजह से केंद्रीय और राज्य सरकार की योजनाएं यहाँ वोटों में तब्दील नहीं हो पाईं।
भौगोलिक विभाजन: कहाँ फंसा है पेच?
इन 61 कठिन सीटों का एक बड़ा हिस्सा पूर्वी और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में फैला हुआ है:
| क्षेत्र | सीटों की संख्या | प्रमुख प्रभावित जिले |
|---|---|---|
| पूर्वी उत्तर प्रदेश (पूर्वांचल) | 22 सीटें | आज़मगढ़, मऊ, जौनपुर, गाज़ीपुर और मिर्ज़ापुर |
| पश्चिमी उत्तर प्रदेश | 13 सीटें | सहारनपुर, मुरादाबाद और बिजनौर |
मुस्लिम और जाट बहुल सीटों पर सपा का तिलिस्म
2022 के विधानसभा चुनावों में, इन 35 (पूर्वी + पश्चिमी) सीटों में से अकेले समाजवादी पार्टी (सपा) ने 27 सीटों पर कब्जा जमाया था। इन क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी की अच्छी-खासी तादाद है, जो पारंपरिक रूप से भाजपा के खिलाफ एकजुट रही है।
हालाँकि, भाजपा का हौसला हाल ही में स्वार, रामपुर और कुंदरकी जैसी मुस्लिम बहुल सीटों पर हुए उपचुनावों में मिली जीत से बढ़ा है। पार्टी नेताओं का मानना है कि यदि सही रणनीति अपनाई जाए, तो इन दुर्गम क्षेत्रों में भी सेंध लगाई जा सकती है।
जयंत और राजभर का साथ: क्या बदलेगा समीकरण?
2017 में हिंदुत्व और विकास के एजेंडे पर 312 सीटें जीतने वाली भाजपा 2022 में 255 सीटों पर आ सिमटी थी। इसका मुख्य कारण था कि ओमप्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) और जयंत चौधरी की राष्ट्रीय लोक दल (RLD) समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में थे। राजभर की पार्टी ने तब इन मुश्किल सीटों में से 3 पर जीत दर्ज की थी।
अब बदली हुई परिस्थिति भाजपा के पक्ष में है:
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RLD और सुभासपा अब भाजपा के साथ: जयंत चौधरी और ओमप्रकाश राजभर अब एनडीए (NDA) सरकार का हिस्सा हैं।
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जाट-ओबीसी समीकरण: पश्चिमी यूपी में जाटों और पूर्वांचल में राजभर (OBC) वोटों के जुड़ने से भाजपा को उम्मीद है कि सपा का पुराना तिलिस्म टूट जाएगा।
निष्कर्ष
चुनाव में अभी साल भर से ज्यादा का समय बाकी है, लेकिन भाजपा ने अपनी सबसे कमजोर नस को पहचानकर उस पर काम करना शुरू कर दिया है। यदि भाजपा इन 61 सीटों के समीकरण को बदलने में कामयाब रहती है, तो 2027 में ‘मिशन-300+’ का उसका सपना हकीकत में बदल सकता है। वहीं, विपक्ष के लिए इन गढ़ों को बचाए रखना एक बड़ी चुनौती होगी।
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