कोरबा 21 मई । एक तरफ सूबे की विष्णु देव साय सरकार प्रदेश में ‘सुशासन तिहार’ मना रही है, तो दूसरी तरफ जमीनी स्तर पर राजस्व अधिकारियों की कार्यप्रणाली और भ्रष्टाचार के गंभीर मामले सामने आ रहे हैं। कोयलांचल एसईसीएल (SECL) कुसमुंडा क्षेत्र के ग्रामीणों का सब्र आखिरकार प्रशासनिक उपेक्षा और कटघोरा एसडीएम कार्यालय के कथित ‘सितम’ के बाद टूट गया। बुधवार (20 मई) को कोयला खनन और खदान विस्तार के लिए अधिग्रहित किए गए 16 से अधिक गांवों के सैकड़ों भूविस्थापितों ने कटघोरा एसडीएम कार्यालय का घेराव कर दिया।
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तहसील कार्यालयों में सुनियोजित भ्रष्टाचार का आरोप
धरने पर बैठे ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि दीपका, दर्री, कटघोरा तहसील और जिला पुनर्वास शाखा में एक सुनियोजित तरीके से रिश्वत का खेल चल रहा है। ग्रामीणों ने कहा कि मुआवजा, रोजगार, पुनर्वास, वंश वृक्ष, फौती, ऑनलाइन रिकॉर्ड सुधार और राजस्व त्रुटि सुधार जैसे बुनियादी काम महीनों और सालों से लंबित पड़े हैं। जो लोग रिश्वत देने से मना करते हैं, उनकी फाइलों को जानबूझकर दबा दिया जाता है। पूर्व में कई बार शिकायत करने के बावजूद जब कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो ग्रामीणों को मजबूरन आंदोलन का रास्ता चुनना पड़ा।
सैकड़ों परिवारों पर बेघर होने का संकट
एसईसीएल ने जटराज, पड़निया, सोनपुरी, पाली, रिसदी, खोडरी, चुरैल, आमगांव, खैरभावना, गेवरा, जरहाजेल, बरपाली, दुरपा, भैसमाखार, मनगांव, बरमपुर, दुल्लापुर, बरकुटा सहित कई गांवों का अधिग्रहण किया है।
ग्रामीणों की सबसे बड़ी शिकायत यह है कि एसईसीएल इन अधिग्रहित गांवों की सरकारी या निजी भूमि पर सालों से मकान बनाकर रह रहे भूमिहीन परिवारों को पुनर्वास (बसाहट) की पात्रता नहीं दे रहा है। ग्रामीणों ने सवाल उठाया कि जहां एक तरफ पीएम आवास योजना का लक्ष्य भूमिहीनों को छत और मुख्यधारा से जोड़ना है, वहीं एसईसीएल की इस नीति के कारण सैकड़ों गरीब परिवार बेघर होने की कगार पर पहुंच गए हैं।
सिर्फ नाम के साबित हुए ‘राजस्व शिविर’
भूविस्थापितों के अनुसार, एसईसीएल ने खोडरी, रिसदी और पड़निया जैसे गांवों में राजस्व शिविर तो लगाए, लेकिन वे सिर्फ नाम के साबित हुए। शिविरों में केवल आवेदन जमा कराए गए और उनके निराकरण के लिए लोगों को फिर से दीपका तहसील के चक्कर काटने के लिए छोड़ दिया गया। ग्रामीणों की मांग है कि भ्रष्टाचार को रोकने के लिए इन शिविरों के भीतर ही मौके पर मामलों का तत्काल निपटारा किया जाना चाहिए।
ड्रोन सर्वे और पक्षपात पर उठाए सवाल
आंदोलनकारियों ने एसईसीएल द्वारा किए जा रहे ड्रोन सर्वे पर भी तीखी आपत्ति दर्ज कराई है। उनका कहना है कि ग्रामीणों की बिना सहमति के सर्वे करके उनकी संपत्ति का मनमाना मूल्यांकन किया जा रहा है और मुआवजे की राशि में कटौती की जा रही है। इसके अलावा, जटराज गांव में साल 2010 में हुए भू-अधिग्रहण का मामला भी गरमाया हुआ है, जहां आधे ग्रामीणों को मसाहती मानकर और आधे को न मानकर प्रशासन पर खुलकर पक्षपात करने का आरोप लगाया गया है।
जनप्रतिनिधियों की निष्क्रियता से नाराजगी
ग्रामीणों ने प्रशासन के साथ-साथ स्थानीय राजनीतिक नेतृत्व को भी कटघरे में खड़ा किया। उनका कहना है कि मुख्यमंत्री के सुशासन के दावों की जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। स्थानीय अधिकारियों के मन में न तो शासन का डर है और न ही वरिष्ठ अफसरों का। ग्रामीणों ने क्षेत्र के सांसद और विधायकों की निष्क्रियता को भी इस बदहाली का जिम्मेदार ठहराया।
पुलिस बल की तैनाती, आंदोलन की चेतावनी
20 मई को हुए इस उग्र प्रदर्शन के दौरान सैकड़ों की संख्या में ग्रामीण हाथों में तख्तियां और नारे लिखी पट्टियां लेकर एसडीएम कार्यालय के मुख्य गेट पर ही धरने पर बैठ गए। आंदोलन की संवेदनशीलता को देखते हुए मौके पर भारी पुलिस बल तैनात किया गया था। हालांकि प्रशासनिक अधिकारियों ने प्रदर्शनकारियों को समझाने और शांत कराने का प्रयास किया, लेकिन ग्रामीणों ने दो टूक शब्दों में चेतावनी दी है कि जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं होंगी, तब तक उनका यह आंदोलन लगातार जारी रहेगा।








