//राख का सैलाब, व्यवस्था की राख!//
कोरबा 21 मई । विकास की रोशनी देने का दावा करने वाले जब खुद अंधेरे और लापरवाही के गड्ढे में गिर जाएं, तो अंजाम कितना भयानक होता है, इसका सबूत है कोरबा का हसदेव दर्री बैराज। बिजली उत्पादन के नाम पर कोरबा के पर्यावरण और जनजीवन के फेफड़ों में ‘राख’ घोली जा रही है। मात्र डेढ़ महीने के भीतर दूसरी बार HTPS (हसदेव ताप विद्युत गृह) का राखड़ डैम (Ash Dyke) ऐसा फूटा कि हसदेव नदी का पानी पीने लायक तो दूर, खेतों में डालने लायक भी नहीं बचा।
जब ‘अमृत’ बन गया 28% ज़हर!
झाबू-नवागांव में हुए इस हादसे ने पूरे शहर की प्यास को संकट में डाल दिया। आँकड़े हैरान करने वाले हैं:
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28% राख का कॉकटेल: कोहड़िया वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट में जो पानी पहुंचा, उसमें 28 फीसदी तक राख घुली हुई थी। फिल्टर प्लांट हांफ गए, और 67 वार्डों की जनता बूंद-बूंद पानी के लिए तरस गई।
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4.52 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी बर्बाद: प्रदूषित मलबे को साफ करने के लिए पांच दिनों तक बैराज के गेट खोलकर लाखों लीटर पानी बहाना पड़ा।
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₹20.34 करोड़ का तगड़ा ‘जुर्माना’: सिंचाई विभाग ने पानी की इस बर्बादी और प्रदूषण पर कड़ा रुख अपनाते हुए बिजली कंपनी पर तीन गुना दंड लगाया है। याद रहे, मार्च में भी ₹18 करोड़ का फटका लग चुका है!
अंधेर नगरी, चौपट व्यवस्था: 210 MW बिजली भी ठप
लापरवाही सिर्फ पर्यावरण पर भारी नहीं पड़ी, बल्कि खुद विभाग की कमर तोड़ चुकी है। सुरक्षा कारणों से यूनिट-3 और यूनिट-4 को ताला लगाना पड़ा है, जिससे 210 मेगावाट का बिजली उत्पादन पिछले 23 दिनों से ठप है। रोजाना करोड़ों का नुकसान हो रहा है, लेकिन जवाबदेही ‘शून्य’ है।
बड़ा सवाल: छोटे अधिकारियों की बलि चढ़ाकर (निलंबन कर) क्या असली गुनहगारों को बचाया जा रहा है? जिस ठेका कंपनी के जिम्मे रख-रखाव था, उस पर अब तक कोई एक्शन क्यों नहीं हुआ? क्या वो ब्लैकलिस्ट होगी या उसे फिर से खुली छूट मिलेगी?
‘सिस्टम’ से कुछ सीधे और सुलगते सवाल:
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एक बार भूल, दूसरी बार गुनाह? मार्च की घटना के बाद जब कलेक्टर की जांच टीम ने “घोर लापरवाही” पकड़ी थी, तो सुधार क्यों नहीं हुआ?
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ज़मीन और ज़िंदगी का क्या? हसदेव नदी, जलीय जीवों और भूजल (Groundwater) में जो ज़हर घुला है, उसका हर्जाना ₹20 करोड़ के जुर्माने से कैसे पूरा होगा?
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सिर्फ जुर्माने का खेल? क्या मानसून आने से पहले कोई ठोस दीवार खड़ी की जाएगी, या फिर से अगली तबाही और अगले जुर्माने का इंतज़ार हो रहा है?
कोरबा की यह चीख बता रही है कि कागजों पर पर्यावरण संरक्षण के दावे जितने सुनहरे हैं, जमीन पर हकीकत उतनी ही काली और राख जैसी बेजान है।








