Latest News
बस्तर में भीषण सड़क हादसा: यात्रियों से भरी बस पलटी, 1 की मौत, 22 घायल छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में कानून व्यवस्था तार-तार: पूर्व विधानसभा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक से मॉर्निंग वॉक के दौरान मोबाइल स्नैचिंग 🎬 विजय बने सीएम तो ‘गॉडफादर’ ने बढ़ाया हाथ: कमल हासन ने मुख्यमंत्री विजय के सामने रखीं 6 बड़ी मांगें! कोटमी सोनार में बड़ी वारदात: सूने मकान से ₹20 लाख के जेवरात और नगदी पार, जांच में जुटी पुलिस साहब की ‘जुबान’ फिसली या कुर्सी? ड्राइवर को ‘मर्यादा’ सिखाने वाले इंजीनियर साहब खुद नपे! राहुल गांधी के छत्तीसगढ़ दौरे को लेकर कांग्रेस में हलचल तेज: संगठन को मजबूत करने बूथ स्तर पर बदली जाएगी रणनीति
Home » Uncategorized » सत्ता के ‘सूखे’ को खत्म करने की कवायद: पायलट का ‘युवा जोश’ और बघेल का ‘अनुभव’, कितनी बदलेगी कांग्रेस की किस्मत?

सत्ता के ‘सूखे’ को खत्म करने की कवायद: पायलट का ‘युवा जोश’ और बघेल का ‘अनुभव’, कितनी बदलेगी कांग्रेस की किस्मत?

Share:

नई दिल्ली | मुख्य संवाददाता आगामी पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों को देखते हुए कांग्रेस ने अपनी चुनावी बिसात बिछा दी है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने सांगठनिक कौशल और अनुभव को तरजीह देते हुए दिग्गज नेताओं को वरिष्ठ चुनाव पर्यवेक्षक (Senior Election Observers) के रूप में नियुक्त किया है। पार्टी का मुख्य फोकस असम और केरल जैसे राज्यों में सत्ता में वापसी और तमिलनाडु-बंगाल में गठबंधन के साथ अपनी स्थिति मजबूत करने पर है।

कांग्रेस ने 2026 के विधानसभा चुनावों के लिए जो टीम तैयार की है, वह केवल नियुक्तियों की सूची नहीं बल्कि एक सोची-समझी ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ जैसी रणनीति है। लंबे समय से सत्ता का वनवास झेल रही कांग्रेस अब “प्रयोग” के मूड में नहीं, बल्कि “परिणाम” देने के दबाव में है।

केरल: ‘पायलट प्रोजेक्ट’ और युवा नेतृत्व की अग्निपरीक्षा

केरल में सचिन पायलट वरिष्ठ चुनाव पर्यवेक्षक की नियुक्ति करना एक बड़ा दांव है। केरल का चुनावी इतिहास हर पांच साल में सत्ता परिवर्तन (LDF बनाम UDF) का रहा है, लेकिन पिछली बार पिनाराई विजयन ने इस क्रम को तोड़कर इतिहास रच दिया था।

  • रणनीति: पायलट के साथ कन्हैया कुमार और इमरान प्रतापगढ़ी को जोड़कर कांग्रेस ने केरल के युवाओं और अल्पसंख्यक मतदाताओं को साधने की कोशिश की है।

  • उद्देश्य: सचिन पायलट की ‘क्लीन इमेज’ और प्रशासनिक अनुभव का उपयोग केरल के गुटीय संघर्ष को खत्म करने और एक एकजुट चेहरा पेश करने के लिए किया जाएगा।

असम: बघेल और शिवकुमार का ‘मैनेजमेंट मंत्र’

असम में कांग्रेस पिछले एक दशक से भाजपा के ‘अजेय रथ’ को रोकने में विफल रही है। यहाँ भूपेश बघेल  को वरिष्ठ चुनाव पर्यवेक्षक बनाया गया हैं  साथ में डीके शिवकुमार की नियुक्ति यह दर्शाती है कि कांग्रेस अब ‘रिसोर्स मैनेजमेंट’ और ‘जमीनी किलेबंदी’ पर ध्यान दे रही है।

  • भूपेश बघेल का रोल: छत्तीसगढ़ के पूर्व सीएम के पास ग्रामीण वोट बैंक और स्थानीय गौरव (Identity Politics) को उभारने का अनुभव है। वे असम में ‘असमिया पहचान’ और आर्थिक मुद्दों को हवा देंगे।

  • चुनावी गणित: असम में प्रियंका गांधी को स्क्रीनिंग कमेटी का प्रमुख बनाकर पार्टी ने संदेश दिया है कि इस बार उम्मीदवारों का चयन बेहद कड़ा होगा।

‘नॉन-रेजिडेंट’ पर्यवेक्षक: गुटबाजी का परमानेंट इलाज?

कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी रही है—राज्यों के भीतर की अंदरूनी कलह।

  • बाहरी राज्यों के कद्दावर नेताओं (जैसे तमिलनाडु में मुकुल वासनिक) को भेजकर आलाकमान ने स्थानीय नेताओं को यह संदेश दिया है कि ‘दिल्ली की नजर सीधे आपके काम पर है’

  • ये पर्यवेक्षक किसी भी स्थानीय गुट से प्रभावित हुए बिना टिकटों का वितरण करेंगे, जिससे आंतरिक असंतोष की संभावना कम होगी।

मल्लिकार्जुन खरगे का ‘विनबिलिटी’ फॉर्मूला

अध्यक्ष के रूप में खरगे ने स्पष्ट कर दिया है कि 2026 के ये चुनाव 2029 की नींव रखेंगे।

  • अनुभव का संतुलन: बघेल और वासनिक जैसे पुराने दिग्गजों के पास संगठन का गहरा अनुभव है, जबकि पायलट और कन्हैया जैसे चेहरे भविष्य की राजनीति का प्रतिनिधित्व करते हैं।

  • अनुशासन: मुकुल वासनिक और सुदीप राय बर्मन जैसे नेताओं को उन राज्यों (तमिलनाडु, बंगाल) में लगाया गया है जहाँ गठबंधन की राजनीति बहुत जटिल है।

 क्या बदलेगी किस्मत?

इन नियुक्तियों से कांग्रेस ने अपना इरादा साफ कर दिया है—वह अब केवल लड़ने के लिए नहीं, बल्कि जीतने के लिए मैदान में है। हालांकि, भाजपा के मजबूत संगठन और क्षेत्रीय दलों (जैसे TMC, DMK, CPM) की अपनी पकड़ के बीच, इन पर्यवेक्षकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती केवल रणनीति बनाना नहीं, बल्कि उसे बूथ स्तर पर लागू करना होगा।

Leave a Comment