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प्रेमचंद के साहित्य में दलित चेतना पर डॉ. कुमकुम का शोध, पीएचडी की उपाधि से हुईं सम्मानित

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कोरबा, छत्तीसगढ़ 17 दिसंबर।शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में नगर की प्रतिष्ठित शिक्षाविद् डॉ. कुमकुम गुलहरे ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। उन्होंने मुंशी प्रेमचंद के साहित्य में ‘दलित जीवन एवं दलित चेतना’ विषय पर अपना शोध कार्य पूर्ण कर पीएचडी (Ph.D.) की उपाधि प्राप्त की है। उनका यह शोध कार्य डॉ. विद्यावती चंद्राकर के कुशल मार्गदर्शन में संपन्न हुआ।

समाज को नई दिशा देने का प्रयास कमला नेहरू महाविद्यालय में प्राध्यापक के रूप में अपनी सेवाएँ दे चुकीं डॉ. कुमकुम लंबे समय से शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अपने शोध प्रबंध के माध्यम से उन्होंने मुंशी प्रेमचंद की कालजयी रचनाओं में व्याप्त दलितों की उस दयनीय स्थिति को प्रमुखता से उभारा है, जो तत्कालीन समाज में विद्यमान थी। उनके इस शोध का मुख्य उद्देश्य समाज के वंचित वर्ग के उत्थान के लिए जन-जागरूकता फैलाना और एक नई वैचारिक दिशा प्रदान करना है।

साहित्यिक और सामाजिक महत्व अपनी इस उपलब्धि पर डॉ. कुमकुम ने बताया कि डॉ. बी.आर. अंबेडकर और सावित्रीबाई फुले जैसे महापुरुषों ने जिस दलित उत्थान के संकल्प को धरातल पर उतारा, मुंशी प्रेमचंद ने उसी चेतना को अपने साहित्य के जरिए जन-जन तक पहुँचाया। उन्होंने कहा, “प्रेमचंद का साहित्य केवल कहानी या उपन्यास नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव का एक सशक्त दस्तावेज है।”

बौद्धिक जगत में सराहना डॉ. कुमकुम के इस शोध को अकादमिक और सामाजिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जानकारों का मानना है कि यह शोध न केवल प्रेमचंद के साहित्यिक दृष्टिकोण को गहराई से समझने में मदद करेगा, बल्कि समाज निर्माण में भी एक मील का पत्थर साबित होगा। उनकी इस सफलता पर इष्ट मित्रों और शिक्षा जगत से जुड़े लोगों ने हर्ष व्यक्त करते हुए उन्हें उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएँ दी हैं।

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