Prime Minister Narendra Modi’s visit to China: प्रधानमंत्री मोदी 31 अगस्त से 1 सितम्बर तक चीन की यात्रा पर रहने वाले हैं,जहां वे शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन में भाग लेंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आगामी चीन यात्रा के मद्देनजर देश और दुनिया की नजरें भारत-चीन के राजनीतिक एवं आर्थिक संबंधों पर रहने वाली हैं। इस दौरान भारत और चीन के बीच हजारों साल पुराने सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संबंध भी अपने आप में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सांस्कृतिक कूटनीति दोनों देशों के बीच विश्वास और सहयोग का महत्वपूर्ण आधार हैं।
चीन में भारतीय दूतावास के मुताबिक, भारत और चीन के बीच संपर्कों के लिखित रिकॉर्ड कम से कम दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के मौजूद हैं, जो आगे चलकर बौद्ध धर्म और व्यापार के माध्यम से और मजबूत हुए। पीएम मोदी की आगामी यात्रा न केवल समकालीन मुद्दों पर चर्चा का अवसर देगी, बल्कि दोनों देशों की साझा विरासत को फिर से जीवंत करने का भी मौका प्रदान करेगी।
प्राचीन सांस्कृतिक सेतु : बौद्ध धर्म का प्रभाव
भारत और चीन के बीच संबंधों का इतिहास दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से शुरू होता है, जब व्यापारिक संपर्कों ने दोनों सभ्यताओं को जोड़ा। पहली शताब्दी ईस्वी में बौद्ध धर्म के चीन में प्रवेश के साथ यह रिश्ता और गहरा हुआ। चीनी भिक्षु फाह्यान ने 402 ईस्वी में भारत की यात्रा की और 10 वर्षों तक रहकर कई संस्कृत, बौद्ध ग्रंथों का चीनी भाषा में अनुवाद किया। उनकी पुस्तक ‘फो गुओ जी’ एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज है।
भारतीय पिता और चीनी माता से जन्में विद्वान कुमारजीव ने भी संस्कृत सूत्रों का चीनी में अनुवाद किया, जो आज भी प्रासंगिक हैं। पांचवीं शताब्दी में दक्षिण भारतीय भिक्षु बोधिधर्म ने शाओलिन मठ की स्थापना की, जिसने जेन बौद्ध धर्म को चीन में स्थापित किया। सातवीं शताब्दी में ह्वेनसांग (शुआन जांग) ने हर्षवर्धन के शासनकाल में भारत की यात्रा की और बौद्ध ग्रंथों को चीन ले गए, जिनका बाद में ए जर्नी टू द वेस्ट में वर्णन हुआ।
औपनिवेशिक दौर में बौद्ध धर्म का पतन और दोनों देशों में औपनिवेशिक शासन के कारण सांस्कृतिक आदान-प्रदान में कुछ कमी आई, लेकिन 19वीं और 20वीं शताब्दी में स्वतंत्रता संग्राम के दौरान दोनों देशों में दोस्ती की भावना फिर जागी। चीनी विद्वान कांग युई ने 1890 के दशक में भारत में समय बिताया। वहीं रवींद्रनाथ टैगोर ने 1924 में चीन की यात्रा की और 1937 में उनकी प्रेरणा से विश्वभारती विश्वविद्यालय में चीना भवन की स्थापना हुई।
1938 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने डॉ. द्वारकानाथ कोटनीस के नेतृत्व में चिकित्सा मिशन चीन भेजा। जबकि चीनी कलाकार शू बेइहोंग ने 1939-40 में शांतिनिकेतन का दौरा किया। 1950 के दशक में “हिंदी-चीनी भाई-भाई” के दौर में भारतीय फिल्में जैसे आवारा, कारवां और दो बीघा जमीन ने चीनी दर्शकों का दिल जीता।
चीन में भारत की ऐतिहासिक छाप
चीन में कई ऐतिहासिक स्थल भारत के सांस्कृतिक प्रभाव को दर्शाते हैं। गांसु प्रांत के दुनहुआंग में मोगाओ और हजार बुद्ध गुफाएं, जो 366 ईस्वी से 10वीं शताब्दी तक बनीं, भारतीय बौद्ध कला की याद दिलाती हैं। शिनजियांग की बेजेक्लिक और किजिल गुफाएं, लुयांग की लोंगमेन गुफाएं, दात्सु की बाओदिंग गुफाएं और दातोंग की युंगांग गुफाएं भारतीय प्रभाव के प्रतीक हैं। बीजिंग का फाइव पगोडा मंदिर, जो बोधगया मंदिर की शैली में बना, और लुयांग का व्हाइट हॉर्स मंदिर, जहां पहली शताब्दी में भारतीय भिक्षु रहे, दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक सेतु का प्रतीक हैं।
शीआन की बिग गूस पगोडा, जहां शुआन जांग (ह्वेनसांग) ने प्राचीन भारतीय ग्रंथों का अनुवाद किया, और शाओलिन मंदिर, जिसे बोधिधर्म ने स्थापित किया, भारतीय योगदान के जीवंत उदाहरण हैं। क्वानझोउ के कैयुआन मंदिर में शिव और विष्णु की मूर्तियां और हिंदू मंदिरों के अवशेष भी इस साझा विरासत को दर्शाते हैं। 1933 में पहली बार खोजे जाने के बाद से, क्वानझोउ में 300 से अधिक हिंदू स्थापत्य और मूर्तिकला के अवशेष पाए गए हैं।
स्मारक और संग्रहालय
साझा इतिहास के साक्ष्य चीन में कई स्मारक और संग्रहालय भारत-चीन संबंधों की कहानी बयां करते हैं। शिजियाझुआंग में डॉ. कोटनीस का स्मारक, शीआन में शुआन जांग (ह्वेनसांग) के ग्रंथों का संग्रहालय, ग्वांगझू में पारसी कब्रिस्तान और हांगझोउ में टैगोर संग्रहालय इस साझा इतिहास के प्रमाण हैं।
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