नई दिल्ली 26 सितंबर 2026 :भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) के कामकाज और आंतरिक फैसलों को लेकर मीडिया रिपोर्टों के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार और पूरी प्रक्रिया पर एक बार फिर राजनीतिक बहस छिड़ गई है। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले कुछ महीनों के दौरान आयोग के कई फैसलों पर आंतरिक रूप से आपत्तियां दर्ज कराई थीं।

रिपोर्ट के मुताबिक, विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान के तहत लिए गए कई फैसलों की जानकारी अन्य चुनाव आयुक्तों को समय पर नहीं दी गई थी, जिस पर उन्होंने सवाल उठाए थे। हालांकि, निर्वाचन आयोग ने इन दावों पर सफाई देते हुए कहा है कि किसी भी बहुसदस्यीय संस्था में विचारों का मतभेद या अलग राय होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। आयोग ने यह स्पष्ट किया कि एसआईआर सहित पिछले एक साल में लिए गए सभी अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से ही पास किए गए हैं।
इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। विपक्ष का आरोप है कि एसआईआर प्रक्रिया में अनियमितताएं हुई हैं और इसके लिए मुख्य चुनाव आयुक्त ज़िम्मेदार हैं। कांग्रेस सूत्रों के अनुसार विपक्षी दल संसद में उनके खिलाफ प्रस्ताव लाने की रणनीति बना रहे हैं, वहीं कॉकरोच जनता पार्टी ने ज्ञानेश कुमार से इस्तीफे की मांग करते हुए आंदोलन की चेतावनी दी है।
मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति कैसे होती है?
भारत में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 324 में निहित है। इसके अलावा ‘मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023’ के तहत नियुक्ति की प्रक्रिया तय होती है:
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चयन समिति की भूमिका: सीईसी और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा एक तीन सदस्यीय चयन समिति की सिफारिश पर की जाती है। इस समिति में भारत के प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं।
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योग्यता और कार्यकाल: अधिनियम के अनुसार, इस पद के लिए भारत सरकार के सचिव स्तर के अधिकारी रहे व्यक्तियों को चुना जाता है, जिनके पास चुनावी प्रबंधन का अनुभव हो। इनका कार्यकाल 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु (जो भी पहले हो) तक होता है।
मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने का नियम क्या है?
मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाना आसान नहीं है। चुनाव आयोग को राजनीतिक दबावों से मुक्त और स्वतंत्र बनाए रखने के लिए हटाने की प्रक्रिया को बेहद कठोर बनाया गया है:
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सुप्रीम कोर्ट के जज के समान प्रक्रिया: संविधान के अनुच्छेद 324(5) और 2023 के अधिनियम की धारा 11(2) के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त को केवल उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिस तरह उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) के किसी न्यायाधीश को हटाया जाता है।
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हटाने का आधार: अनुच्छेद 124(4) के तहत केवल “सिद्ध कदाचार” (Proven Misbehaviour) या “अक्षमताओं” (Incapacity) के आधार पर ही हटाया जा सकता है।
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संसद में प्रस्ताव का नियम:
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सांसदों का समर्थन: इस प्रक्रिया को शुरू करने के लिए लोकसभा के कम से कम 100 सदस्यों या राज्यसभा के कम से कम 50 सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित नोटिस पीठासीन अधिकारी (अध्यक्ष/सभापति) को देना होता है।
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जांच समिति: यदि पीठासीन अधिकारी प्रस्ताव स्वीकार कर लेते हैं, तो आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया जाता है।
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विशेष बहुमत: यदि जांच में आरोप सिद्ध होते हैं, तो संसद के दोनों सदनों में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई (2/3) बहुमत से इस प्रस्ताव को पारित होना अनिवार्य है।
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राष्ट्रपति का आदेश: दोनों सदनों में विशेष बहुमत से पारित होने के बाद राष्ट्रपति पद से हटाने का औपचारिक आदेश जारी करते हैं।
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क्या पहले कभी किसी सीईसी को हटाया गया है?
भारतीय इतिहास में अब तक किसी भी मुख्य चुनाव आयुक्त पर महाभियोग (रिमूवल प्रोसीडिंग्स) की प्रक्रिया सफल नहीं हुई है और न ही किसी को इस प्रक्रिया से हटाया गया है।
इससे पहले भी विपक्षी दलों द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ हटाने के प्रस्ताव दिए गए थे, जिन्हें लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति द्वारा खारिज कर दिया गया था। चुनाव आयुक्तों की निष्पक्षता और संवैधानिक स्वायत्तता को बनाए रखने के लिए ही इस प्रक्रिया को इतना सख्त रखा गया है।📍








