कोरबा छत्तीसगढ़ 22 सितंबर 2026 NICU Success Story : कहते हैं कि अगर इरादे बुलंद हों और सही हाथों का साथ मिल जाए, तो उम्मीद की सबसे बारीक किरण भी उजाले का समंदर बन जाती है। कोरबा के शिवाय हॉस्पिटल से सामने आई एक खबर ने इस बात को साबित कर दिखाया है। महज 600 ग्राम वजन और 25 सप्ताह (करीब 6 महीने) के बेहद क्रिटिकल गर्भकाल में जन्मे एक नवजात ने जिंदगी की जंग जीत ली है। 90 दिनों तक लगातार NICU की गहन निगरानी में रहने के बाद अब यह मासूम 2 किलो 70 ग्राम का होकर पूरी तरह स्वस्थ स्थिति में अपने घर जाने के लिए तैयार है।

4 साल का इंतजार और 15 जून की वो चुनौतीपूर्ण रात
सर्वमंगला नगर, कोरबा निवासी विजय समर्थ और उनकी पत्नी बीते चार वर्षों से अपने आंगन में बच्चे की किलकारी गूंजने का इंतजार कर रहे थे। 15 जून 2026 की देर रात (करीब 1 बजे) गर्भवती महिला को गंभीर और बेहद आपातकालीन स्थिति में शिवाय हॉस्पिटल लाया गया। गर्भकाल केवल 25 सप्ताह का था, जो कि चिकित्सकीय दृष्टि से अत्यंत जोखिम भरा माना जाता है।
अस्पताल की विशेषज्ञ टीम ने बिना समय गंवाए आपातकालीन जांच शुरू की और रात 2:20 बजे डिलीवरी कराई गई। जब बच्चे का जन्म हुआ, तो खुशियों के साथ-साथ परिजनों के सामने एक बहुत बड़ी चुनौती आ खड़ी हुई—बच्चा बेहद नाजुक था और उसका वजन महज 600 ग्राम था।
90 दिनों का संघर्ष: NICU में हर पल की मॉनिटरिंग
अति-प्रीमैच्योर (Micro-preemie) होने के कारण नवजात के अंग पूरी तरह विकसित नहीं हुए थे। उसे तुरंत अस्पताल के NICU (Neonatal Intensive Care Unit) में शिफ्ट किया गया। अगले 3 महीनों तक हर एक दिन बच्चे और डॉक्टरों की टीम के लिए परीक्षा की घड़ी रहा।
चिकित्सकीय स्तर पर बच्चे को निम्नलिखित विशेष मेडिकल सपोर्ट दिए गए:
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श्वसन सहायता (Respiratory Support): कमजोर फेफड़ों को सहारा देने के लिए वेंटिलेटर और ऑक्सीजन सपोर्ट।
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नियंत्रित तापमान (Thermoregulation): इनक्यूबेटर के जरिए शरीर के तापमान को स्थिर रखना।
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संक्रमण से बचाव एवं पोषण: बेहद सूक्ष्म स्तर पर इंफेक्शन कंट्रोल और विशेष डाइट सपोर्ट।
वरिष्ठ शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. नागेंद्र बागरी (Paediatric Specialist) के नेतृत्व में आरएमओ डॉ. प्रवीण, डॉ. बरखा (ड्यूटी डॉक्टर) और NICU की पूरी नर्सिंग टीम ने दिन-रात बच्चे की निगरानी की।
डर से उम्मीद तक का सफर: 600 ग्राम से 2.070 किलोग्राम
बच्चे के पिता विजय समर्थ उस भावुक पल को याद करते हुए बताते हैं कि जब उन्होंने पहली बार अपने बच्चे को देखा था, तो वह इतना छोटा था कि हाथ में लेते हुए भी डर लगता था। लेकिन डॉक्टर्स और नर्सिंग स्टाफ के आश्वासन और लगातार मेडिकल केयर ने परिवार की हिम्मत टूटने नहीं दी।
धीरे-धीरे डॉक्टरों की मेहनत रंग लाने लगी:
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15 जून: जन्म के समय वजन 600 ग्राम
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19 सितंबर: 90 दिनों की देखरेख के बाद वजन बढ़कर 2.070 किलोग्राम
डॉ. नागेंद्र बागरी ने बताया कि बच्चे के सभी वाइटल्स अब सामान्य हैं, वजन में संतोषजनक सुधार हुआ है और वह पूरी तरह से रिकवर कर चुका है। अब उसे अस्पताल से सुरक्षित डिस्चार्ज करने की तैयारी पूरी कर ली गई है।
चिकित्सा क्षेत्र में एक मिसाल
मेडिकल साइंस में 25 हफ्ते और 600 ग्राम वजन वाले प्रीमैच्योर बच्चों की उत्तरजीविता (Survival Rate) को एक बड़ी चुनौती माना जाता है। शिवाय हॉस्पिटल ,कोरबा की टीम ने इस जटिल केस को सफलता पूर्वक संभालकर न सिर्फ परिवार को उनकी सबसे बड़ी खुशी लौटाई है, बल्कि क्षेत्र के चिकित्सा सेवा के उच्च स्तर को भी रेखांकित किया है।








