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अलविदा गज़ल के जादूगर: मशहूर शायर डॉ. बशीर बद्र नहीं रहे , ग़रीबों की बेबसी और सियासत के दोहरे चेहरे को दी थी आवाज़

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हुस्न-ओ-इश्क़ ही नहीं, ग़रीबों की बेबसी और सियासत के दोहरे चेहरे को भी बशीर साहब ने दी थी आवाज़

भोपाल 29 मई। उर्दू शायरी और अदब की दुनिया के सबसे जगमगाते सितारे, पद्मश्री डॉ. बशीर बद्र अब हमारे बीच नहीं रहे। गुरुवार दोपहर करीब 12 बजे मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल स्थित अपने निवास पर उन्होंने अंतिम सांस ली। वह 91 वर्ष के थे। बशीर साहब पिछले लंबे समय से भूलने की बीमारी (डिमेंशिया) से पीड़ित थे। बीमारी के चलते पिछले कुछ सालों में उनकी याददाश्त इतनी कमजोर हो गई थी कि वे अपने बेहद करीबियों को भी नहीं पहचान पा रहे थे। उनके निधन की खबर से देश-विदेश में फैले उनके करोड़ों प्रशंसकों और साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।

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मुशायरों की जान और आम आदमी की आवाज़

डॉ. बशीर बद्र उन गिने-चुने शायरों में से थे, जिन्होंने उर्दू शायरी को भारी-भरकम और मुश्किल शब्दों के चंगुल से निकालकर आम बोलचाल की भाषा में ढाला। यही वजह थी कि उनकी गज़लें सिर्फ मुशायरों के मंचों तक सीमित नहीं रहीं। प्रेमियों के खतों से लेकर, लोगों की डायरियों और आज के दौर में सोशल मीडिया व वॉट्सऐप स्टेटस पर उनकी लिखी पंक्तियाँ हर दिल की धड़कन बनी रहीं।

हुस्न-ओ-इश्क़ के साथ सियासत और ग़रीब के चूल्हे पर भी किया तीखा तंज़

आमतौर पर बशीर बद्र को मोहब्बत का शायर माना जाता है, लेकिन उनका कलम समाज के ताने-बाने, ग़रीबों की तकलीफ़ों और हुकूमत (सरकार) के दोहरे रवैये पर भी उतनी ही बेबाकी से चला। उन्होंने बड़ी सादगी से रोज़मर्रा के शब्दों में ग़रीब की भूख और नेताओं की साज़िशों का पूरा कच्चा चिट्ठा खोलकर रख दिया था।

जब वे लिखते हैं— “लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में” तो यह सीधे तौर पर दंगों और नफ़रत की राजनीति करने वाले हुक्मरानों पर करारा तंज़ होता है। वहीं, नेताओं के झूठे वादों और तंत्र के पहरे पर उनका यह शेर आज भी उतना ही मौजूं है— “सच्चाई खुद छुप जाती है, जब झूठ पे पहरे होते हैं।”

अदब की महफ़िल में हमेशा जिंदा रहेंगे बशीर साहब के ये अनमोल शेर:

बशीर साहब भले ही इस दुनिया से रुखसत हो गए हों, लेकिन जिंदगी, मोहब्बत, ग़रीब और सरकार पर कहे गए उनके ये सदाबहार शेर हमेशा जिंदा रहेंगे:

1. महँगाई और ग़रीब की बेबसी पर:

“ज़िंदगी तू ने मुझे कब्र से कम दी है जगह, पाँव फैलाऊँ तो दीवार में सर लगता है।”

2. नेताओं के झूठे वादों और सियासत पर सीधा वार:

“सारे जिस्म पर चोटें हैं, सब घाव पुराने गहरे हैं, सच्चाई खुद छुप जाती है, जब झूठ पे पहरे होते हैं।”

3. सत्ता और बड़े लोगों के घमंड पर तंज़:

“बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना, जहाँ दरिया समंदर से मिला दरिया नहीं रहता।”

4. समाज की नफ़रत और आशियाने उजड़ने का दर्द:

“लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में।”

5. मोहब्बत और जिंदगी का सबसे खूबसूरत फलसफा:

“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए।”

6. नए दौर के रिश्तों की कड़वी हकीकत:

“कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से, ये नए मिजाज का शहर है ज़रा फासले से मिला करो।”

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