रायपुर/बिलासपुर। छत्तीसगढ़ की राजनीति के सबसे काले अध्यायों में से एक, रामावतार जग्गी हत्याकांड में न्याय का पहिया आखिरकार पूरा घूम चुका है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक मिसाल कायम करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के पुत्र अमित जोगी को दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई है।
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अदालत ने निचली अदालत के उस फैसले को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें अमित जोगी को ‘संदेह का लाभ’ देकर आजाद किया गया था।
हाईकोर्ट की ‘सर्जिकल स्ट्राइक’: कृत्रिम भेदभाव नहीं चलेगा
माननीय न्यायालय ने अपने फैसले में “समान साक्ष्य, समान न्याय” के सिद्धांत को सर्वोपरि रखा। अदालत की तल्ख टिप्पणी ने कानून के रसूख को फिर से स्थापित किया:
“न्याय की तराजू में सभी बराबर हैं। जब सबूत एक जैसे हों, तो साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों के बीच ‘आर्टिफिशियल डिस्क्रिमिनेशन’ (कृत्रिम भेदभाव) नहीं किया जा सकता। यदि 28 लोग उसी साजिश के लिए जेल में हैं, तो मुख्य कड़ी को संदेह का लाभ नहीं मिल सकता।”
घटनाक्रम: 2003 से 2026 तक न्याय का सफर
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दहशत की वो रात: 4 जून 2003 को रायपुर की सड़कों पर NCP नेता रामावतार जग्गी को गोलियों से भून दिया गया था।
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निचली अदालत का ‘झटका’: मई 2007 में विशेष अदालत ने 28 लोगों को तो अंदर भेजा, लेकिन अमित जोगी को बरी कर दिया था।
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बेटे की जिद: जग्गी के पुत्र सतीश जग्गी ने हार नहीं मानी और सुप्रीम कोर्ट तक की कानूनी लड़ाई लड़ी, जिसके परिणाम स्वरूप आज हाईकोर्ट ने यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया।
सलाखों के पीछे के बड़े नाम
इस मामले में पहले से ही सजा काट रहे दोषियों की सूची लंबी है, जिसमें सत्ता और वर्दी का गठजोड़ साफ दिखता है:
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याहया ढेबर (राजनैतिक रसूखदार)
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चिमन सिंह (मुख्य शूटर)
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खाकी पर दाग: 2 तत्कालीन CSP और एक थाना प्रभारी।
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अन्य: अभय गोयल, वीके पांडे और फिरोज सिद्दीकी समेत कुल 28 आरोपी।
सियासी भूचाल: क्या जोगी की राजनीति पर लगेगा विराम?
अमित जोगी को सजा मिलने के बाद छत्तीसगढ़ का सियासी पारा सातवें आसमान पर है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला न केवल अपराधियों के मन में डर पैदा करेगा, बल्कि ‘कानून से ऊपर कोई नहीं’ के संदेश को भी पुख्ता करेगा।
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