विशेष रिपोर्ट (The khatiya khadi news) कहते हैं कि कृषि के क्षेत्र में अच्छी फसल के लिए जमीन तैयार करना सबसे जरूरी होता है। सूरजपुर के धोंधा गांव में भी जमीन तैयार की जा रही थी—एक भव्य कृषि महाविद्यालय के लिए। लेकिन किसे पता था कि शिक्षा की इस ‘बुआई’ से पहले ही मंच पर ‘धक्का-मुक्की’ की ऐसी फसल लहलहा उठेगी, जिसे देखकर खुद कृषि मंत्री जी भी हैरत में पड़ जाएंगे।
प्रतापपुर विधानसभा का यह सरकारी कार्यक्रम दरअसल एक ‘लाइव एक्शन ड्रामा’ में तब्दील हो गया। मंच पर प्रदेश के कद्दावर नेता और कृषि मंत्री रामविचार नेताम विराजमान थे, साथ में विधायक शकुंतला सिंह पोर्ते भी थीं। माहौल पूरी तरह से विकासमय था, लेकिन तभी भाजपा के दो दिग्गजों—मंडल अध्यक्ष मुकेश तायल और प्रदेश पदाधिकारी अनुप गुप्ता—ने यह साबित कर दिया कि असली ‘विकास’ तो आपसी मतभेदों का हुआ है।
विद्वानों का मानना है कि मंच पर चढ़ने के बाद मर्यादा का ध्यान रखना चाहिए, लेकिन धोंधा के इस मंच पर मर्यादा ने खुद ही अपना इस्तीफा दे दिया। जहाँ ‘कलम’ चलाने की बात होनी थी, वहाँ ‘कोहनियां’ चलने लगीं।
सरकारी प्रोटोकॉल और अनुशासन की दुहाई देने वाली पार्टी के इन ‘अनुशासित’ सिपाहियों ने जनता को यह लाइव डेमो दिया कि सत्ता के गलियारों में बहस कैसे हाथापाई की शक्ल लेती है। प्रत्यक्षदर्शी स्तब्ध थे और समर्थक यह तय नहीं कर पा रहे थे कि तालियाँ बजाएं या बीच-बचाव करें। आखिर कृषि महाविद्यालय है, तो ‘जुताई-बुआई’ का थोड़ा-बहुत अभ्यास तो मंच पर ही बनता था!
हैरानी की बात यह है कि इस ‘दंगल’ के दौरान मंच पर मौजूद वरिष्ठ नेता मूकदर्शक बने रहे। शायद वे भी यह समझने की कोशिश कर रहे थे कि महाविद्यालय खुलने से पहले यह कौन सी नई ‘प्रैक्टिकल क्लास’ शुरू हो गई है। समर्थकों की अफरा-तफरी और नेताओं का वह रौद्र रूप देखकर ऐसा लगा मानो महाविद्यालय में कृषि विज्ञान नहीं, बल्कि ‘युद्ध कौशल’ की पढ़ाई होने वाली है।
अब इस घटना के बाद क्षेत्र की राजनीति में एक नई खाद पड़ गई है। विपक्षी दल इस ‘फसल’ को काटने की तैयारी में हैं और जनता यह सोच रही है कि जिस नींव में ही दरारें (और धक्के) पड़ गए हों, वहां भविष्य की इमारत कितनी मजबूत होगी। खैर, सूरजपुर के इन माननीय नेताओं ने यह तो साफ कर दिया है कि राजनीति में ‘शक्ति प्रदर्शन’ के लिए किसी अखाड़े की जरूरत नहीं होती, एक सरकारी मंच ही काफी है।
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