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मौत की सुरंग: कोख में दफन हुए 18 चिराग, मेघालय की खदानों से फिर उठी चीखें

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शिलांग/गुवाहाटी: वो घर से निकले थे इस उम्मीद में कि पत्थर तोड़कर अपने परिवार की किस्मत संवारेंगे। किसी को अपनी बेटी की शादी करनी थी, तो किसी को बूढ़े माता-पिता की दवा के पैसे जुटाने थे। लेकिन उन्हें क्या पता था कि जिस जमीन को वो सीना चीरकर कोयला निकालने के लिए खोद रहे हैं, वही उनकी कब्र बन जाएगी।

कैसे हुआ हादसा? 

गुरुवार, 5 फरवरी 2026 की सुबह। मेघालय के ईस्ट जैंतिया हिल्स स्थित ताशखाई इलाके की एक सुदूर खदान में काम सामान्य रूप से शुरू हुआ था। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, सुबह करीब 11:00 बजे जब मजदूर खदान की गहराई में थे, तभी अचानक एक कान फोड़ देने वाला धमाका हुआ।

धमाका इतना शक्तिशाली था कि आसपास की धरती डोल गई और खदान का एक बड़ा हिस्सा ढह गया। जहरीली गैसों और मलबे के बीच मजदूरों को संभलने का मौका तक नहीं मिला। धुएं का गुबार छंटने के बाद जो मंजर दिखा, वो रूह कंपा देने वाला था—चारों तरफ सिर्फ चीखें और अपनों को तलाशते बेबस लोग।

असम के गांवों में पसरा मातम

इस भीषण हादसे में मारे गए 18 मजदूरों में से अधिकांश असम के रहने वाले थे। जैसे ही यह खबर असम के गांवों में पहुंची, वहां चूल्हे ठंडे पड़ गए।

अपनों का इंतजार: मारे गए लोगों में कई युवा थे जो अपने घर के इकलौते कमाऊ सदस्य थे।

खौफनाक मंजर: बचावकर्मियों (NDRF और SDRF) को क्षत-विक्षत शवों को बाहर निकालने में भारी मशक्कत करनी पड़ी, जो इस धमाके की तीव्रता को बयां कर रहे थे।

अवैध खनन का ‘खूनी’ खेल

एनजीटी (NGT) के प्रतिबंध के बावजूद, मेघालय के इन इलाकों में ‘रैट-होल माइनिंग’ और अवैध खनन का खेल धड़ल्ले से जारी है।

  1. सुरक्षा की अनदेखी: खदानों में ब्लास्ट के लिए अवैध विस्फोटकों का इस्तेमाल बिना किसी सुरक्षा मानक के किया जाता है।

  2. प्रशासनिक चूक: इतनी बड़ी संख्या में मजदूरों का वहां काम करना और प्रशासन को भनक न होना, मिलीभगत की ओर इशारा करता है।

  3. मजबूरी का फायदा: गरीब मजदूरों की सुरक्षा से ज्यादा कोयले के मुनाफे को तवज्जो दी गई।

“हम गरीबी से लड़ रहे थे, पर इस धमाके ने तो हमारी पूरी नस्ल ही उजाड़ दी।” — एक पीड़ित परिजन के शब्द

निष्कर्ष

सरकार ने मुआवजे और जांच के आदेश दे दिए हैं, लेकिन क्या चंद रुपयों से उन 18 परिवारों के आंसुओं की कीमत चुकाई जा सकती है? जब तक इन ‘मौत की सुरंगों’ पर स्थायी लगाम नहीं लगेगी, तब तक न जाने कितने और निर्दोष मजदूर सिस्टम की इस खदान में बलि चढ़ते रहेंगे।