कोरबा। जिला खनिज संस्थान न्यास (DMF) के धन में मची बंदरबांट और कुप्रबंधन की परतें अब खुलने लगी हैं। राज्य शासन द्वारा गठित तीन सदस्यीय जांच दल के सामने शुक्रवार को याचिकाकर्ताओं और ग्रामीणों ने तीखे तेवर दिखाते हुए प्रशासन को कठघरे में खड़ा कर दिया। सीधे तौर पर आरोप लगाया गया कि जिस पैसे पर खदान प्रभावितों और आदिवासियों का हक था, उससे रसूखदार ‘मौज’ कर रहे हैं।
विस्थापितों के हक पर डाका: पर्यटन में उड़ाए करोड़ों, जनता खाली हाथ
जांच समिति के सदस्यों—हरिशंकर चौहान, श्रीमती स्मृति तिवारी और श्रीमती स्मिता पाण्डेय—के समक्ष याचिकाकर्ता लक्ष्मी चौहान, सपुरन कुलदीप और अजय श्रीवास्तव ने सवालों की झड़ी लगा दी।
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सतरेंगा मॉडल पर सवाल: पूछा गया कि सतरेंगा जैसे पर्यटन क्षेत्रों में डीएमएफ का पैसा क्यों बहाया गया? जब आय पर्यटन मंडल को जा रही है, तो खनन प्रभावित ग्रामीणों को इसका क्या लाभ मिला?
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दोहरी लूट की आशंका: शिकायतकर्ताओं ने अंदेशा जताया कि जो काम SECL के CSR मद से हुए, उन्हें ही DMF के खाते में दिखाकर राशि का गबन किया गया है।
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दिखावे का विकास: आलीशान भवनों और निर्माण कार्यों पर सवाल उठाते हुए कहा गया कि विभागीय बजट होने के बावजूद DMF की राशि वहां क्यों खपाया गई, जबकि धरातल पर विकास शून्य है।
‘500 गांवों की लिस्ट लाओ, हम करेंगे पोलखोल’
याचिकाकर्ता लक्ष्मी चौहान ने शासन के दावों को खुली चुनौती दी है। उन्होंने जांच दल से मांग की कि न्यायालय में जिन 500 ‘प्रत्यक्ष प्रभावित’ गांवों में कार्य कराने का दावा किया गया है, उनके दस्तावेज सार्वजनिक किए जाएं। चौहान ने कहा, “हमें दस्तावेज दीजिए, हम 5 दिन में दूध का दूध और पानी का पानी कर देंगे।”
भर्तियों में बंदरबांट: ‘निरस्त करो नियुक्तियां’
सपुरन कुलदीप ने डीएमएफ मद से हो रही नियुक्तियों पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने मांग की है कि:
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स्वास्थ्य, शिक्षा और समाज कल्याण विभाग में अब तक हुई सभी संविदा नियुक्तियों को तत्काल निरस्त किया जाए।
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इन पदों पर केवल प्रत्यक्ष प्रभावितों को प्राथमिकता देते हुए पारदर्शी प्रक्रिया से दोबारा भर्ती हो।
जांच दल ने सभी पक्षों को सुना और दस्तावेजों का अवलोकन किया। अब देखना यह है कि यह जांच केवल खानापूर्ति बनकर रह जाती है या कोरबा के असली हकदारों को उनका अधिकार मिलता है।








