नई दिल्ली/लखनऊ, 18 जून: पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की टीएमसी और महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) में हुई ऐतिहासिक टूट के बाद, अब देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश की सियासत से बेहद चौंकाने वाली खबर आ रही है। (आप पढ़ रहे हैं द खटिया खड़ी न्यूज) राजनीतिक गलियारों में कयासों का बाजार गर्म है कि क्या बगावत का अगला नंबर समाजवादी पार्टी (SP) का है?
इस महा-सस्पेंस को हवा दी है उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर के एक विस्फोटक दावे ने। राजभर के इस बयान के बाद लखनऊ से लेकर दिल्ली तक हड़कंप मच गया है।
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राजभर का वो दावा, जिसने उड़ा दी सियासी नींद
बुधवार को ओम प्रकाश राजभर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पहले ट्विटर) पर एक ऐसा पोस्ट किया, जिसने विपक्षी खेमे में खलबली मचा दी।(आप पढ़ रहे हैं द खटिया खड़ी न्यूज) राजभर ने सीधे तौर पर दावा किया कि अखिलेश यादव की पार्टी के भीतर एक बहुत बड़ी स्क्रिप्ट लिखी जा चुकी है।
“समाजवादी पार्टी में बड़ी टूट होगी। राम गोपाल यादव ने केंद्रीय मंत्री अमित शाह को चिट्ठी सौंपी है। खनन घोटाला और गोमती रिवर फ्रंट घोटाले का मास्टरमाइंड कौन है, पूरा यूपी जानता है। शिकंजा कस रहा है तो सपा परेशान है। महाराष्ट्र-बंगाल छोड़िए, पूरी सपा भाजपा में शामिल होने को तैयार बैठी है।” — ओम प्रकाश राजभर (अध्यक्ष, सुभासपा)
इस बयान के बाद यह सवाल तेजी से तैरने लगा है कि क्या वाकई सपा के सांसद और विधायक भी टीएमसी-शिवसेना की तरह पाला बदलने वाले हैं? हालांकि, अभी तक इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन कूटनीतिक गलियारों में इसे ‘धुआं उठा है तो आग जरूर होगी’ की तरह देखा जा रहा है।
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अखिलेश यादव का पलटवार: “जो डरेगा, वो चला जाएगा…”
इस संभावित टूट और राजभर के दावों पर समाजवादी पार्टी के मुखिया और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने तुरंत प्रतिक्रिया दी। (आप पढ़ रहे हैं द खटिया खड़ी न्यूज) उन्होंने दावों को खारिज तो किया, लेकिन उनके बयान में एक अजीब सा डर और चेतावनी साफ महसूस की जा रही थी।
अखिलेश यादव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा:
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डरने वाले जाएंगे: “भाजपा का इतिहास रहा है कि वह लालच और दबाव डालकर नेताओं को तोड़ती है। अगर आप यूपी को देखेंगे तो पहले भी कई सपा विधायक, एमएलसी और राज्यसभा सदस्य पार्टी छोड़कर गए। इसके पीछे कोई निजी स्वार्थ, लालच या डर रहा होगा। जो लोग डर जाते हैं, वे अपनी पार्टी छोड़ देते हैं।”
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सपा एकजुट है: उन्होंने साफ किया कि उनकी पार्टी पूरी तरह मजबूत है। अपने सफर में सपा ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं और वह इस बार भी एकजुट बनी रहेगी।
इनसाइड स्टोरी: ‘डिलिमिटेशन बिल’ और 363 का जादुई आंकड़ा
अब सवाल उठता है कि अचानक विपक्ष की बड़ी पार्टियों (TMC, शिवसेना और अब कथित तौर पर सपा) में इस कदर भगदड़ क्यों मची है? इसके पीछे की ‘इनसाइड स्टोरी’ संसद के पिछले सत्र और डिलिमिटेशन बिल (परिसीमन विधेयक) से जुड़ी हुई है।
दरअसल, केंद्र सरकार लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाकर 850 करने और महिला आरक्षण (33%) को लागू करने के लिए संविधान संशोधन बिल लाई थी। चूंकि यह संविधान संशोधन था, इसलिए इसके लिए दो-तिहाई (2/3) बहुमत की जरूरत थी। एनडीए के पास आंकड़ा कम होने के कारण यह बिल गिर गया था, जिसे राहुल गांधी और विपक्ष ने अपनी बड़ी जीत बताया था।
अब पासा पूरी तरह पलटता हुआ दिख रहा है। बीजेपी किसी भी कीमत पर इस ऐतिहासिक बिल को पास कराना चाहती है, जिसके लिए उसे संसद में 363 सांसदों का अचूक समर्थन चाहिए।
आंकड़ों का नया चक्रव्यूह: क्या सपा बनेगी बीजेपी का ‘हथियार’?
वर्तमान में लोकसभा में आंकड़ों का खेल बेहद दिलचस्प हो चुका है:
| राजनीतिक स्थिति | सांसदों की संख्या / समीकरण |
|---|---|
| NDA की मूल ताकत (2024) | 293 सांसद |
| TMC और शिवसेना के बागी | + 26 सांसद (एनडीए का वर्तमान बल = 319) |
| दो-तिहाई बहुमत के लिए जरूरी | 363 सांसद (अभी भी 44 सीटें कम) |
| लोकसभा में सपा की ताकत | 37 सांसद (बीजेपी और कांग्रेस के बाद तीसरी बड़ी पार्टी) |
बड़ा सियासी गणित: सूत्रों की मानें तो अगर समाजवादी पार्टी के भीतर एक बड़ा धड़ा टूटकर एनडीए के पाले में आ जाता है या वोटिंग के वक्त वॉकआउट कर जाता है, तो बीजेपी आसानी से 363 के जादुई आंकड़े को पार कर लेगी। इसके साथ ही डीएमके (DMK) के इंडिया गठबंधन से अलग होने के बाद उसे भी साधने की कोशिशें जारी हैं।
यदि यह गणित सटीक बैठता है, तो मानसून या आगामी सत्र में मोदी सरकार दोबारा ‘डिलिमिटेशन’ और ‘महिला आरक्षण’ से जुड़े ऐतिहासिक विधेयकों को संसद के पटल पर रख सकती है। अब देखना यह है कि अखिलेश यादव अपने कुनबे को बीजेपी के इस ‘मिशन 363’ से बचा पाते हैं या नहीं!
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