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13 साल का संघर्ष थमा: जाते-जाते कई जिंदगियों को रौशन कर गए गाजियाबाद के हरीश राणा

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// हरीश राणा ने मंगलवार को दिल्ली एम्स में अंतिम सांस ली। PTI ने सूत्रों के हवाले से इसकी पुष्टि की है। 31 साल के हरीश 13 साल से कोमा में थे। सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च को इच्छामृत्यु की इजाजत दी थी।//

गाजियाबाद: साहस, संघर्ष और सर्वोच्च बलिदान की एक ऐसी कहानी, जिसने आज हर आंख को नम कर दिया। पिछले 13 वर्षों से कोमा में रहकर जिंदगी और मौत के बीच जंग लड़ रहे गाजियाबाद के हरीश राणा आज पंचतत्व में विलीन हो गए। लेकिन उनकी यह विदाई सामान्य नहीं थी; यह मानवता के एक नए अध्याय की शुरुआत थी।

विदाई के समय भी दिखाया अदम्य साहस

हरीश राणा का संघर्ष साल 2011 से शुरू हुआ था। बताया जा रहा है कि जब उन्हें अंतिम समय में अस्पताल ले जाया जा रहा था, तब उन्होंने हाथ जोड़कर सभी से विदा ली। यह दृश्य वहां मौजूद हर व्यक्ति को भावुक कर गया, जो उनके भीतर की गहरी संवेदनाओं और साहस का प्रमाण था।

अंगदान से बने ‘अमर’: कई घरों में लौटेंगी खुशियां

हरीश राणा का शरीर भले ही साथ छोड़ गया, लेकिन उन्होंने जाते-जाते ‘अंगदान’ के रूप में मानवता की सबसे बड़ी मिसाल पेश की है। उनके परिजनों ने उनके अंग दान करने का निर्णय लिया है, जिससे:

धड़कता रहेगा दिल: उनका हृदय अब किसी अन्य व्यक्ति के सीने में धड़क कर उसे नया जीवन देगा।

रोशन होगी दुनिया: उनकी आंखों से कोई देख सकेगा और अंधेरी दुनिया में रोशनी आएगी।

मिलेगा नया जीवन: अन्य अंगों के माध्यम से भी कई गंभीर मरीजों को मौत के मुंह से बाहर निकाला जा सकेगा।

“हरीश का जाना एक अंत नहीं, बल्कि कई जिंदगियों की नई शुरुआत है। उनका त्याग समाज को अंगदान के प्रति जागरूक करने के लिए एक मशाल का काम करेगा।”

विनम्र श्रद्धांजलि

 I।।

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