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गृहिणियां हैं असली ‘राष्ट्र निर्माता’, सेवाओं का न्यूनतम मूल्य ₹30,000 प्रतिमाह हो: सुप्रीम कोर्ट

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नई दिल्ली, 11 जून:

देश की शीर्ष अदालत ने गृहिणियों (Homemakers) के योगदान को लेकर एक बेहद ऐतिहासिक और दूरगामी फैसला सुनाया है। उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा है कि गृहिणियां वास्तव में “राष्ट्र निर्माता” हैं और समाज में उनके योगदान को उचित मान्यता मिलनी चाहिए। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि किसी दुर्घटना की स्थिति में पत्नी द्वारा घर-परिवार की देखभाल से मिलने वाली सेवाओं की क्षति का मौद्रिक मूल्यांकन (Monetary Valuation) कम से कम 30,000 रुपये प्रतिमाह के आधार पर किया जाना चाहिए।

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कुशल-अकुशल श्रमिकों से तुलना करना गलत

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने मोटर वाहन अधिनियम से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। पीठ ने कहा कि अब तक मृत गृहिणियों के मुआवजे का निर्धारण न्यूनतम मजदूरी के आधार पर उन्हें कुशल या अकुशल श्रमिक मानकर किया जाता था, जो कि सही नहीं है।

“यह बेहद विडंबनापूर्ण है कि गृहिणी को परिवार के कमाने वाले सदस्यों पर निर्भर माना जाता है, जबकि हकीकत यह है कि पूरा परिवार और उसका संचालन पूरी तरह से गृहिणी पर ही निर्भर करता है। कमाने वाले सदस्य अपनी जिम्मेदारियां इसलिए निभा पाते हैं क्योंकि घर को एक गृहिणी संभालती है।” — सुप्रीम कोर्ट

भारत की GDP में 15 से 17% योगदान

अदालत ने आर्थिक आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि महिलाओं का बिना वेतन वाला घरेलू और देखभाल का कार्य भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लगभग 15 से 17 प्रतिशत का योगदान देता है। इसके बावजूद, इस बड़े योगदान को कोई आधिकारिक या सामाजिक मान्यता नहीं मिलती। पीठ ने उम्मीद जताई कि भविष्य में ‘हाउसवाइफ’ या ‘होममेकर’ की जगह समाज उनके लिए ‘राष्ट्र निर्माता’ शब्द का सम्मानपूर्वक प्रयोग करेगा।

1 साल के भीतर हो मोटर दुर्घटना दावों का निपटारा

मामलों में होने वाली देरी पर चिंता व्यक्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सभी उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों को कड़े निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा कि मोटर दुर्घटना मुआवजा दावों से जुड़े मामलों का निपटारा हर हाल में एक वर्ष के भीतर किया जाना चाहिए और लंबे समय से लंबित मामलों की निगरानी के लिए विशेष निर्देश जारी किए जाने चाहिए।

क्या था पूरा मामला?

यह ऐतिहासिक फैसला पंजाब के 25 नवंबर 2001 के एक सड़क हादसे से जुड़ा है, जिसमें एक महिला की मृत्यु हो गई थी।

  • ट्रिब्यूनल का फैसला: मृतक महिला के पति और तीन बच्चों को शुरुआत में मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण ने 2.42 लाख रुपये का मुआवजा दिया था।

  • हाईकोर्ट का फैसला: परिवार ने असंतुष्ट होकर हाईकोर्ट का रुख किया, जिसने राशि बढ़ाकर 8.43 लाख रुपये (7.5% ब्याज के साथ) की।

  • सुप्रीम कोर्ट का फैसला: परिवार फिर भी संतुष्ट नहीं हुआ और सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां शीर्ष अदालत ने गृहिणियों की सेवाओं का नया पैमाना तय करते हुए पीड़ित परिवार को अतिरिक्त मुआवजा प्रदान करने का आदेश दिया।

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