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छत्तीसगढ़: निगम-मंडलों में ‘नो वर्क, नो पे’ की तैयारी, कड़ाई करने के मूड में साय सरकार

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रायपुर। छत्तीसगढ़ की विष्णुदेव साय सरकार और भाजपा संगठन अब फिजूलखर्ची रोकने और शुचिता बनाए रखने के लिए एक बड़े और कड़े फैसले की ओर बढ़ रहे हैं। विश्वस्त सूत्रों के अनुसार, सरकार विभिन्न निगमों, मंडलों, आयोगों और प्राधिकरणों में मनोनीत अध्यक्षों एवं उपाध्यक्षों के वेतन और भत्ते बंद करने पर गंभीरता से विचार कर रही है।

आर्थिक बोझ और ‘जनसेवा’ का संकल्प

इस फैसले के पीछे मुख्य कारण राज्य की वित्तीय स्थिति और विभिन्न संस्थाओं का घाटे में होना बताया जा रहा है। सरकार वर्तमान में अपनी जनकल्याणकारी योजनाओं (महतारी वंदन जैसी मुफ्त योजनाएं) पर लगभग 37 हजार करोड़ रुपए खर्च कर रही है। ऐसे में घाटे में चल रहे निगम-मंडलों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ डालना तर्कसंगत नहीं माना जा रहा है।

संगठन के नेताओं के बीच हुई प्रारंभिक चर्चा में यह बात निकलकर आई है कि:

  • सभी मनोनीत पदाधिकारियों की बैठक बुलाकर उन्हें स्पष्ट संदेश दिया जाएगा कि उनकी नियुक्ति ‘जनसेवा’ के लिए हुई है, न कि आर्थिक लाभ के लिए।

  • यदि किसी पदाधिकारी को बिना वेतन-भत्ते काम करने पर आपत्ति है, तो वे पद से त्यागपत्र दे सकते हैं।

सुविधाओं पर भी लगेगी ‘लगाम’

न केवल वेतन, बल्कि सरकारी सुविधाओं के दुरुपयोग पर भी कैंची चलने वाली है। चर्चा के मुताबिक, अब वाहन और ईंधन (डीजल-पेट्रोल) के खर्च की एक निश्चित सीमा तय की जाएगी। यह सुविधा केवल इसलिए दी जाएगी ताकि जनहित के कार्यों के लिए उनके आवागमन में कोई बाधा न आए।

भ्रष्टाचार पर ‘जीरो टॉलरेंस’ और छवि सुधार की कवायद

सरकार के पास कुछ क्षेत्रों से अवैध वसूली की शिकायतें भी पहुंची हैं। सूत्रों का कहना है कि भाजपा के कुछ नए पदाधिकारी, पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के तौर-तरीकों को अपना रहे हैं।

  • सख्त मॉनिटरिंग: संदिग्ध गतिविधि वाले चेहरों की पहचान कर उन्हें तत्काल पद से हटाने की रणनीति है।

  • पुराने नेताओं को मौका: जिन पुराने और निष्ठावान नेताओं को अब तक पदों से वंचित रखा गया है, उन्हें आगे लाने पर विचार हो सकता है ताकि संगठन की छवि बेदाग बनी रहे।

लक्ष्य स्पष्ट है: अगले दो वर्षों में सरकार और संगठन की छवि को जनता के बीच पूरी तरह स्वच्छ रखना, ताकि आगामी चुनावों में किसी भी प्रकार की ‘एंटी-इंकम्बेंसी’ (सत्ता विरोधी लहर) से बचा जा सके।

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