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बालको चिमनी कांड : न्याय की बलि चढ़ती फाइलें और चीनी ‘फरार’ आरोपी

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कोरबा की वह काली दोपहर आज भी इंसाफ की पुकार कर रही है। 23 सितंबर 2009 को जब 240 मीटर ऊंची कंक्रीट की मीनार ढही, तो वह सिर्फ मलबा नहीं था, बल्कि उन 41 मजदूरों के सपनों की कब्रगाह थी। आज 16 साल बीत जाने के बाद भी न्याय की कछुआ चाल यह गंभीर सवाल खड़ा करती है कि क्या हमारी व्यवस्था केवल रसूखदार कंपनियों के हितों के आगे विवश है?

भारतीय कानून को विदेशी ‘चुनौती’

इस भयावह कांड के मुख्य आरोपी—चीनी कंपनी सेप्को (SEPCO) के अधिकारी वू चुनान, लियु गैक्सन और वॉन वेगिंग—डेढ़ दशक बाद भी कानून की गिरफ्त से दूर हैं। विशेष अदालत द्वारा बार-बार समन जारी होने के बावजूद, ये अधिकारी कभी ‘फ्लाइट’ तो कभी ‘अनुमति’ का बहाना बनाकर न्याय प्रक्रिया का मजाक उड़ा रहे हैं। सवाल यह है कि क्या हमारी संप्रभुता इतनी कमजोर है कि विदेशी कंपनियां हमारे नागरिकों की जान की जवाबदेही से तकनीकी बहानों के पीछे छिपकर बच निकलें? आखिर इन आरोपियों की गैर-मौजूदगी पर अब तक कोई कठोर कूटनीतिक कदम क्यों नहीं उठाया गया?

बख्शी आयोग: पन्नों में कैद गुनहगार

जस्टिस संदीप बख्शी न्यायिक जांच आयोग ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से बालको, सेप्को और जीडीसीएल की ‘आपराधिक लापरवाही’ को उजागर किया था। रिपोर्ट में दर्ज है कि कैसे घटिया निर्माण सामग्री और सुरक्षा मानकों की अनदेखी ने इस सामूहिक मृत्यु को आमंत्रित किया। लेकिन विडंबना देखिए, जिस रिपोर्ट को दोषियों को सलाखों के पीछे भेजने का आधार बनना था, वह आज कोर्ट की अलमारियों में धूल फांक रही है। क्या उन 41 परिवारों के आंसू इतने सस्ते हैं कि उनकी कीमत केवल ‘तारीख-पर-तारीख’ है?

भरोसे की टूटती दीवार

बिहार के सारण से लेकर छत्तीसगढ़ के स्थानीय गांवों तक, वे परिवार आज भी न्याय की आस में बूढ़े हो रहे हैं जिन्होंने अपने घर के चिरागों को इस लालच की भेंट चढ़ते देखा था। 16 साल का लंबा समय किसी भी न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करने के लिए पर्याप्त है। जब न्याय मिलने में इतनी देरी होती है, तो आम आदमी का इस भरोसे से विश्वास उठने लगता है कि कानून सबके लिए बराबर है।

: बालको की चिमनी गिरना एक तकनीकी विफलता हो सकती है, लेकिन 16 साल तक न्याय न मिलना एक प्रणालीगत विफलता है। यह समय केवल संवेदना जताने का नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने का है। यदि अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाकर दोषियों को कठघरे में नहीं लाया गया, तो यह उन 41 आत्माओं के साथ सबसे बड़ा विश्वासघात होगा।

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