भोपाल 07/11/2026:मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने चेक बाउंस (Check Bounce) के मामलों में शिकायतकर्ताओं को बड़ी राहत देते हुए एक महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट की है। अब चेक बाउंस के मामले में आरोपित के बरी होने पर शिकायतकर्ता को हाई कोर्ट से विशेष अनुमति (Special Leave) लेने की आवश्यकता नहीं होगी, बल्कि वह सीधे संबंधित सेशन कोर्ट (सत्र न्यायालय) में अपील कर सकेगा।

क्या है पूरा मामला?
यह पूरा मामला उज्जैन के एक न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी की अदालत से जुड़ा हुआ है। वर्ष 2019 में नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट (N.I. Act) की धारा 138 के तहत चेक बाउंस का एक परिवाद दर्ज किया गया था। इस मामले में विचारण न्यायालय ने 12 अगस्त 2024 को फैसला सुनाते हुए परिवाद को निरस्त कर दिया और आरोपित को बरी कर दिया था। इस आदेश से असंतुष्ट होकर परिवादी ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ का दरवाजा खटखटाया था।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का आधार
सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष सुप्रीम कोर्ट के एक महत्वपूर्ण न्याय दृष्टांत (सेलिस्टियम फाइनेंशियल बनाम ए. ज्ञानसेकरन) का हवाला दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस फैसले में स्पष्ट किया था कि चेक बाउंस होने के कारण वित्तीय या आर्थिक नुकसान उठाने वाला शिकायतकर्ता भी कानून की नजर में एक ‘पीड़ित’ (Victim) है। इसलिए, उसे आरोपित के बरी किए जाने के आदेश के खिलाफ अपील दायर करने का पूरा अधिकार है और इसके लिए उसे दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 378(4) के तहत हाई कोर्ट से विशेष अनुमति लेने की कोई अनिवार्यता नहीं है।
60 दिन के भीतर अपील करने की स्वतंत्रता
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी ने याचिकाकर्ता को आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने के 60 दिनों के भीतर संबंधित सेशन कोर्ट में अपील दाखिल करने की पूरी स्वतंत्रता प्रदान की है। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिए हैं कि यदि निर्धारित समय-सीमा के भीतर अपील प्रस्तुत की जाती है, तो सेशन कोर्ट केवल देरी या समय-सीमा का तकनीकी आधार बनाकर उसे खारिज नहीं करेगा, बल्कि मामले की गुण-दोष के आधार पर निष्पक्ष सुनवाई करेगा।
पहले और अब की व्यवस्था में क्या अंतर आया है?
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पहले की कानूनी स्थिति: जब चेक बाउंस के मामले में अदालत द्वारा आरोपित को बरी कर दिया जाता था, तब शिकायतकर्ता को इसके खिलाफ अपील करने के लिए अनिवार्य रूप से हाई कोर्ट में विशेष अनुमति (Special Leave) याचिका दायर करनी पड़ती थी। जब तक हाई कोर्ट से अनुमति नहीं मिलती थी, तब तक अपील पर सुनवाई संभव नहीं हो पाती थी।
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अब की नई व्यवस्था: नवीनतम कानूनी व्याख्या के अनुसार, चेक बाउंस के पीड़ित शिकायतकर्ता को ‘पीड़ित’ की श्रेणी में माना गया है। अब उसे हाई कोर्ट के चक्कर काटने या विशेष अनुमति लेने की जरूरत नहीं है, बल्कि वह पीड़ित के वैधानिक अधिकारों के तहत सीधे सेशन कोर्ट में अपील कर सकता है।
कानूनी प्रावधान:
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पूर्ववर्ती कानून (CrPC): पहले दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 378(4) के अंतर्गत विशेष अनुमति का प्रावधान था, जिसे अब संशोधित माना गया है। अब CrPC की धारा 372 के परंतुक (Proviso) के तहत पीड़ित को अपील का सीधा अधिकार प्राप्त है।
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नया आपराधिक कानून (BNSS): नए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) में इसका समकक्ष और प्रासंगिक प्रावधान धारा 413 के अंतर्गत आता है।




