ग्वालियर 07/11/2026। आमतौर पर लोग मंदिरों की सीढ़ियाँ सुख, समृद्धि, अच्छी सेहत या नौकरी की कामना लेकर चढ़ते हैं। लेकिन ग्वालियर के फूलबाग चौराहे के पास स्थित मारकंडेश्वर महादेव मंदिर की कहानी पूरी तरह जुदा है। यहाँ श्रद्धालु जीवन की खुशियों के साथ-साथ मृत्यु के बाद की शांति और सुगम विदाई की प्रार्थना करने पहुँचते हैं। लगभग तीन शताब्दियों (300 साल) पुराना यह मंदिर देश के उन गिने-चुने स्थानों में से एक है, जहाँ भगवान शिव के साथ उनके समकालीन माने जाने वाले यमराज की भी पूजा की जाती है।

मराठा शासनकाल के दौरान निर्मित इस मंदिर का सिंधिया राजघराने से गहरा ऐतिहासिक संबंध रहा है। मंदिर के गर्भगृह में शिवलिंग के समीप ही यमराज की दुर्लभ प्रतिमा स्थापित है। यहाँ यमराज को किसी भयानक या क्रोधित देवता के रूप में नहीं, बल्कि ‘धर्मराज’—यानी धर्म के रक्षक और न्याय के प्रतीक के रूप में पूजा जाता है। मंदिर के पुजारी बताते हैं कि यहाँ आने वाले भक्तों को मृत्यु से डरना नहीं, बल्कि यह स्वीकार करना सिखाया जाता है कि मृत्यु जीवन का अंत नहीं, बल्कि एक पड़ाव मात्र है।
नरक चतुर्दशी पर उमड़ती है अपार भीड़
नरक चतुर्दशी (नरक चौदस) के दिन मंदिर का दृश्य पूरी तरह से बदल जाता है। तड़के से ही दूर-दराज के क्षेत्रों से आए श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लग जाती हैं। विशेष रूप से महिलाएँ अपने परिवार की सुरक्षा और दीर्घायु के लिए यमराज के नाम का दीपक जलाती हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन यहाँ दीपदान करने से अकाल मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है।
अनूठी है पूजन परंपरा
मारकंडेश्वर महादेव मंदिर की पूजा विधि भी अन्य देवालयों से काफी भिन्न है:
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जल एवं पंचामृत अभिषेक: सर्वप्रथम भगवान शिव का जलाभिषेक किया जाता है। इसके पश्चात यमराज की प्रतिमा का पंचामृत, घी और तिल के तेल से अभिषेक कर इत्र अर्पित किया जाता है।
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चार मुखी दीपक की आरती: पूजन के बाद चार मुख वाले विशेष चांदी के दीपक से यमदेव की भव्य आरती उतारी जाती है।
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दिव्य वातावरण: आरती के दौरान शंखनाद और घंटियों की ध्वनि से पूरा मंदिर परिसर आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर हो उठता है।
सदियों से आस्था का केंद्र बना यह मंदिर आज भी लोगों को जीवन के अंतिम सत्य से सहजता से जोड़ता है।




