📍सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से मांगा जवाब📍अदालत ने अस्पतालों के फार्मेसी पर भी सवाल उठाए
नई दिल्ली 30 सितंबर 2026 Cancer Medicine Price : सुप्रीम कोर्ट ने देश में आवश्यक और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों की दवाओं की लागत और उनके बिक्री मूल्य (MRP) के बीच भारी अंतर पर गहरी चिंता जताई है। शीर्ष अदालत ने कहा कि कीमतों में इतनी अत्यधिक बढ़ोतरी से मरीजों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ता है और वे कंगाली के कगार पर पहुंच जाते हैं।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार से सवाल किया कि कैंसर की जीवनरक्षक दवाओं का अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) खुदरा विक्रेताओं की खरीद दर से 16% अधिक के स्तर पर सीमित क्यों नहीं किया जा सकता, जैसा कि औषधि मूल्य नियंत्रण आदेश (DPCO), 2013 के तहत अधिसूचित दवाओं के लिए प्रावधान है।
सुनवाई के मुख्य बिंदु:
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10 गुना का बड़ा अंतर: न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने कैंसर की एक दवा का उदाहरण देते हुए कहा कि खुदरा विक्रेताओं (रिटेलर्स) के लिए इसकी कीमत लगभग ₹2,700 थी, जबकि मरीजों के लिए इसका MRP ₹27,000 तय किया गया था।
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सीमित दायरा: DPCO के तहत केवल 10% दवाएं ही मूल्य नियंत्रण के दायरे में आती हैं। बाकी 90% गैर-अधिसूचित दवाओं पर दवा कंपनियां हर साल 10% तक कीमत बढ़ाने के लिए स्वतंत्र हैं।
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अस्पतालों के फार्मेसी पर सवाल: अदालत ने कॉरपोरेट अस्पतालों के जरिए बेची जाने वाली दवाओं पर भी चिंता जताई, जहां मरीजों को अनिवार्य रूप से अस्पताल के अंदर की दुकानों से ही महंगी दवाएं खरीदनी पड़ती हैं।
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सरकार का पक्ष: केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने स्वीकार किया कि यह एक गंभीर मुद्दा है और सभी हितधारकों के बीच संतुलन बनाने वाले तंत्र की आवश्यकता है।
दवा उद्योग की सफाई: दूसरी ओर, फार्मा उद्योग के अधिकारियों का कहना है कि PTR (प्राइस टू रिटेलर) और MRP के बीच के अंतर को कंपनियों का शुद्ध मुनाफा नहीं माना जाना चाहिए। कैंसर और बायोलॉजिकल दवाओं के भंडारण के लिए कोल्ड-चेन, विशेष ट्रांसपोर्टेशन, डिस्ट्रीब्यूटर मार्जिन, टैक्स और एक्सपायरी जैसे कई खर्च शामिल होते हैं, जिससे अंतिम कीमत बढ़ जाती है।



