नई दिल्ली 19 जून : देश की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी और ‘नारी शक्ति’ के बड़े-बड़े दावों की जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है।(आप पढ़ रहे हैं द खटिया खड़ी न्यूज ) ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ (ADR) और ‘नेशनल इलेक्शन वॉच’ की ताजा संयुक्त रिपोर्ट ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। इस रिपोर्ट के आंकड़ों ने यह साफ कर दिया है कि तमाम दावों और वादों के बावजूद, भारतीय राजनीति में महिलाओं की स्थिति अभी भी हाशिए पर है।
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ऐतिहासिक ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023’ (महिला आरक्षण बिल) संसद से पारित होने के बाद उम्मीद की जा रही थी कि स्थितियां बदलेंगी, लेकिन जमीन पर पुरुष प्रधान मानसिकता अब भी हावी है। (आप पढ़ रहे हैं द खटिया खड़ी न्यूज)
आंकड़ों की जुबानी: ‘आधी आबादी’ को सिर्फ 10% हिस्सेदारी
ADR द्वारा देशभर के सांसदों और विधायकों के किए गए व्यापक विश्लेषण में जो आंकड़े सामने आए हैं, वे बेहद चिंताजनक हैं:
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कुल प्रतिनिधित्व: देश भर के कुल 4,666 सांसदों और विधायकों में से केवल 464 महिलाएं हैं। यह कुल संख्या का मात्र 10 प्रतिशत है।
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उम्मीदवारों का टोटा: केवल चुने हुए प्रतिनिधियों में ही नहीं, बल्कि चुनाव लड़ने वाले कुल उम्मीदवारों में भी महिलाओं की संख्या महज 10 प्रतिशत के आसपास ही सिमट कर रह गई है।
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शून्य महिला निर्वाचन क्षेत्र: लोकसभा चुनावों के दौरान देश के कई निर्वाचन क्षेत्र ऐसे थे, जहां मुख्यधारा की पार्टियों तो दूर, निर्दलीय के रूप में भी एक भी महिला उम्मीदवार मैदान में नहीं उतरी।
टिकट वितरण में राजनीतिक दलों का दोहरा मापदंड
चुनावी रैलियों में महिला सशक्तिकरण की बात करने वाले राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दल टिकट बांटने के समय ‘जीतने की क्षमता’ (Winnability) का बहाना बनाकर पुरुषों को प्राथमिकता देते हैं। (आप पढ़ रहे हैं द खटिया खड़ी न्यूज) चुनावी राजनीति में आज भी पितृसत्तात्मक सोच और पुरुष प्रधानता का बोलबाला साफ नजर आता है।
जमीनी स्तर बनाम मुख्यधारा की राजनीति
रिपोर्ट में एक दिलचस्प और विरोधाभासी पहलू भी सामने आया है। स्थानीय निकाय चुनावों (पंचायत और नगर पालिका) में आरक्षण के कारण महिलाओं की भागीदारी बेहतरीन है और वे बढ़-चढ़कर नेतृत्व कर रही हैं। लेकिन जैसे ही बात मुख्यधारा की राजनीति (विधानसभा और लोकसभा) की आती है, महिलाओं के लिए एंट्री बैरियर (प्रवेश की बाधाएं) बहुत कड़े हो जाते हैं।
जनता की आवाज: “केवल कागजों पर आरक्षण का बिल लाने या नारे गढ़ने से ‘आधी आबादी’ को उनका हक नहीं मिलेगा। इसके लिए राजनीतिक दलों को अपनी ‘नियत’ और सोच बदलनी होगी।”
भविष्य का सवाल: क्या जनगणना के बाद बदलेगी सूरत?
‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023’ को अगली जनगणना और परिसीमन (Delimitation) के बाद लागू किया जाना तय हुआ है।(आप पढ़ रहे हैं द खटिया खड़ी न्यूज) ऐसे में आम महिलाओं के मन में यह बड़ा सवाल है कि क्या जनगणना के बाद वाकई स्थितियां बदलेंगी और उन्हें 33% आरक्षण मिलेगा? या फिर राजनीति के शीर्ष पायदान पर पहुंचने के लिए महिलाओं को अभी एक और लंबा और थका देने वाला इंतजार करना होगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक राजनीतिक दल आंतरिक रूप से (Internal Party Democracy) महिलाओं को आगे नहीं बढ़ाएंगे, तब तक जमीनी सुधार लाना नामुमकिन है।








