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लेंस का जादूगर खामोश: रघु राय ने दुनिया को कहा अलविदा, तस्वीरों में छोड़ गए भारत की रूह

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नई दिल्ली 26 अप्रैल 2026 :

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भारतीय फोटो पत्रकारिता के शिखर पुरुष रघु राय अब यादों की रील में समा गए हैं। 83 वर्ष की आयु में, कैंसर से एक लंबी और साहसी लड़ाई लड़ने के बाद आज सुबह उन्होंने अंतिम सांस ली। लगभग छह दशकों तक अपने कैमरे के जरिए भारत के इतिहास को जीवंत करने वाले रघु राय का जाना एक युग का अंत है।

इतिहास के चश्मदीद गवाह

रघु राय ने केवल तस्वीरें नहीं खींचीं, बल्कि वक्त को कैद किया। 1971 के युद्ध में पाकिस्तानी सेना का आत्मसमर्पण हो, भोपाल गैस त्रासदी की चीखती खामोशी हो, या फिर 2020-21 का किसान आंदोलन—उनके कैमरे ने हमेशा सच का साथ दिया। ढलती उम्र में भी उनका जज्बा युवाओं जैसा था, जो किसान आंदोलन की उनकी आखिरी बड़ी कवरेज में साफ झलका।

इंदिरा और मदर टेरेसा से जुड़े अनछुए किस्से

बीबीसी के साथ एक पुराने साक्षात्कार में रघु राय ने अपनी जिंदगी के कई पन्ने साझा किए थे। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को एक ‘प्रतिबद्ध नेता’ और ‘कला प्रेमी’ बताया था। रघु राय के अनुसार, इंदिरा गांधी को बखूबी पता होता था कि फोटोग्राफर उन्हें किस कोण से देख रहा है। आपातकाल के दौरान विरोध से लेकर उनकी हत्या के बाद ‘इंडिया टुडे’ का विशेष अंक निकालने तक, रघु राय ने इंदिरा गांधी के हर पहलू को बारीकी से देखा था।

वहीं मदर टेरेसा को याद करते हुए उन्होंने उन्हें ‘ममता की मूरत’ कहा था। उनके अनुसार, मदर का प्यार और ऊर्जा हर किसी को अभिभूत कर देती थी। चाहे दलाई लामा हों या उस्ताद बिस्मिल्लाह खान, रघु राय ने हर महान शख्सियत के भीतर के ‘इंसान’ को अपनी तस्वीरों में उतारा।

विशिष्ट नजर, बेमिसाल विरासत

रघु राय की खासियत थी कि वे साधारण दृश्यों में भी असाधारण कहानियाँ ढूंढ लेते थे। उनकी ‘विशिष्ट नजर’ ने प्राकृतिक आपदाओं से लेकर देश की महान धरोहरों तक को एक नया आयाम दिया। उनके जाने से कला और पत्रकारिता के क्षेत्र में जो रिक्तता आई है, उसे शायद ही कभी भरा जा सकेगा।

महान कलाकार को शत-शत नमन और भावभीनी श्रद्धांजलि।


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