कोरबा 7 अप्रैल 2026 : जहाँ एक तरफ दुनिया 6G की तैयारी कर रही है और मंगल ग्रह पर प्लॉट काटने की बातें हो रही हैं, वहीं कोरबा जिले के पाली विकासखंड का ग्राम छिंदपहरी आज भी ‘पाषाण काल’ के रोमांचक अनुभव को सहेज कर रखे हुए है। 30 धनुहार आदिवासी परिवारों वाले इस गांव ने विकास की ऐसी “तेज रफ्तार” पकड़ी है कि आज तक पक्की सड़क, बिजली और पानी जैसी मामूली चीजें इन्हें छू तक नहीं पाईं। आप पढ़ रहे हैं द खटिया खड़ी न्यूज।
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“खाट एम्बुलेंस” की विश्वस्तरीय सुविधा
यहाँ के ग्रामीणों ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की नई मिसाल पेश की है। जब भी कोई बीमार होता है, तो ये किसी सरकारी एम्बुलेंस का इंतज़ार कर अपनी कीमती सांसें बर्बाद नहीं करते। यहाँ ‘फोर-व्हीलर’ नहीं, बल्कि ‘फोर-हैंडेड’ यानी खाट पर उठाकर मरीज को जंगलों और ऊबड़-खाबड़ रास्तों से ले जाने की प्राचीन विधा जीवित है। प्रशासन शायद यह सोचकर सड़क नहीं बनवा रहा कि कहीं ग्रामीण अपनी यह “पारंपरिक एम्बुलेंस सेवा” न भूल जाएं।
सोलर पैनल: बिजली नहीं, सिर्फ सजावट
गाँव में सोलर पैनल तो ऐसे लगाए गए हैं जैसे किसी शादी में पुराने झूमर लटका दिए गए हों। ये पैनल दिन भर धूप तो खाते हैं, लेकिन रात को रोशनी देने के नाम पर “मौन व्रत” धारण कर लेते हैं। बच्चे मिट्टी के तेल की कुप्पी में भविष्य ढूंढ रहे हैं, क्योंकि प्रशासन को लगता है कि अंधेरे में पढ़ने से बच्चों की ‘आईसाइट’ डिजिटल रोशनी से बची रहेगी।
फाइलों में दौड़ता विकास, हकीकत में थमी सांसे
हैरानी की बात तो यह है कि सरकारी कागजों में विकास की गंगा इतनी तीव्र बह रही है कि शायद छिंदपहरी का नक्शा ही उस बाढ़ में बह गया है। बजट स्वीकृत होते हैं, योजनाएं बनती हैं और फाइलों पर डामर की सड़कें भी बिछ जाती हैं, बस वो धरातल पर उतरना भूल जाती हैं।
यक्ष प्रश्न: जब साहब की गाड़ी का पहिया गड्ढे में फंसता है तो तत्काल सड़क बनती है, पर जहाँ पूरी जिंदगी गड्ढों में कैद हो, वहां ‘सर्वे’ कब खत्म होगा?
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