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आखिरी सांसों का पहरा: क्या विज्ञान हारेगा या ममता का ‘चमत्कार’ जीतेगा?

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नई दिल्ली 23 मार्च : एम्स ट्रॉमा सेंटर के आईसीयू वार्ड नंबर 12 के बाहर एक सन्नाटा पसरा है, जो चीखता तो नहीं पर रूह को कंपा देता है। अंदर से आ रही मशीनों की ‘बीप’ की आवाज़ें मानो एक थकी हुई जिंदगी की आखिरी दस्तक हैं। यहाँ 32 साल का हरीश राणा लेटा है—वह शख्स जो 13 सालों से मौत और जिंदगी की धुंधली सरहद पर खड़ा था, और आज देश में ‘पैसिव इच्छामृत्यु’ की पहली कानूनी प्रक्रिया का केंद्र बन गया है।

सतर्कता और संवेदना के बीच डॉक्टर

सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक आदेश के बाद, एम्स के डॉक्टरों ने हरीश का लाइफ सपोर्ट सिस्टम (वेंटिलेटर और फीडिंग ट्यूब) हटा लिया है। अब वह किसी मशीन के सहारे नहीं, बल्कि अपनी आखिरी बची हुई ताकत से सांसें ले रहा है। डॉक्टरों की टीम, जिसकी अगुवाई डॉ. सीमा मिश्रा कर रही हैं, एक अजीब सी बेचैनी में है। वे विज्ञान के नियमों का पालन तो कर रहे हैं, लेकिन उनकी प्राथमिकता अब केवल यह है कि हरीश को जाते-जाते रत्ती भर भी ‘दर्द’ न हो। उसे सामान्य बेड पर शिफ्ट कर दिया गया है, जहाँ उसकी हालत स्थिर है, पर वापसी की उम्मीदें विज्ञान की किताबों में धुंधली पड़ चुकी हैं।

हनुमान चालीसा और पिता के सूखे आंसू

अस्पताल के ठंडे गलियारे में एक माँ बैठी है, जिसके हाथों में हनुमान चालीसा है और आँखों में अटूट विश्वास। वह कहती हैं, “मेरा बेटा सांस ले रहा है, उसकी धड़कन चल रही है… वह मुझे छोड़कर कैसे जा सकता है?” माँ आज भी किसी चमत्कार की आस में है। वहीं पास खड़े पिता की आँखों के आँसू अब सूख चुके हैं। पत्थर हो चुके कलेजे के साथ वे बस डॉक्टरों से एक ही गुहार लगा रहे हैं— “मेरे बेटे को अंत समय में तकलीफ न हो।” यह एक ऐसा मंजर है जहाँ विज्ञान की सीमाएं खत्म होती हैं और एक परिवार की बेबसी शुरू होती है।

मौत में भी छिपी है जिंदगी की मुस्कान

भले ही हरीश ‘ब्रेन डेड’ की उस स्थिति में है जहाँ से लौटना नामुमकिन माना जाता है, लेकिन वह जाते-जाते ‘अमर’ होने की तैयारी कर रहा है। एम्स की ऑर्गन रिट्रीवल टीम ने परिवार से बात की है। अगर चमत्कार नहीं होता, तो हरीश का दिल किसी और के सीने में धड़केगा, उसकी आँखों से कोई और दुनिया देखेगा और उसकी किडनियां किसी मरते हुए को जीवनदान देंगी।

13 साल का लंबा इंतजार अब अपने अंतिम पड़ाव पर है। हरीश राणा की यह कहानी सिर्फ एक मरीज की मौत की दास्ताँ नहीं है, बल्कि यह उस त्याग की मिसाल है जहाँ एक इंसान अपनी आखिरी सांसों के साथ आधा दर्जन और जिंदगियों को महका जाएगा।


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