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वंदे मातरम्’ पर संसद में महासंग्राम: PM मोदी, शाह और खड़गे, प्रियंका के हमलों से क्यों गरमाई सियासत?

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 बहस की आवश्यकता और पृष्ठभूमि

नई दिल्ली 10 दिसंबर: वंदे मातरम्’ पर संसद (लोकसभा और राज्यसभा) में विशेष चर्चा उसके 150वें वर्ष (बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की रचना के 150 साल) के उपलक्ष्य में आयोजित की गई।

सरकार का उद्देश्य: सरकार का कहना है कि इस चर्चा का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रगीत के ऐतिहासिक महत्व, स्वतंत्रता संग्राम में उसकी भूमिका को देश की युवा पीढ़ी तक पहुँचाना है।

विपक्ष का आरोप: विपक्ष (विशेष रूप से कांग्रेस) ने आरोप लगाया कि सरकार बेरोजगारी, गिरते रुपये, चीन से जुड़े सीमा विवाद और चुनावी सुधारों (जैसे ‘SIR’ और BLO की मौतें) जैसे वास्तविक मुद्दों से देश का ध्यान भटकाने के लिए जानबूझकर इस भावनात्मक मुद्दे को उठा रही है। कांग्रेस ने यह भी कहा कि चर्चा का समय आगामी बंगाल चुनावों को देखते हुए तय किया गया है।

 किसने क्या कहा (प्रमुख वक्तव्य)

1. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (लोकसभा)

  • कांग्रेस पर सीधा वार: PM मोदी ने कांग्रेस पर 1937 में ‘वंदे मातरम्’ के महत्वपूर्ण छंदों को हटाकर समझौता करने का आरोप लगाया।

  • तुष्टिकरण और विभाजन: उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के विरोध के सामने घुटने टेके, जिससे ‘वंदे मातरम्’ का विभाजन हुआ और देश के विभाजन के बीज भी बोए गए।

  • राष्ट्रीय गौरव: उन्होंने इस गीत को स्वतंत्रता संग्राम की आवाज़ और राष्ट्रीय स्वाभिमान की नींव बताया।

2. गृह मंत्री अमित शाह (राज्यसभा)

  • नेहरू और तुष्टिकरण: शाह ने चर्चा की शुरुआत करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पर सीधा हमला किया। उन्होंने आरोप लगाया कि नेहरू ने 1937 में तुष्टिकरण की नीति के कारण ‘वंदे मातरम्’ को केवल दो पदों तक सीमित कर दिया, और देश के विभाजन की शुरुआत वहीं से हुई।

  • इमरजेंसी का ज़िक्र: उन्होंने कहा कि जब ‘वंदे मातरम्’ 100 साल का हुआ, तो इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाकर उन लोगों को जेल भेजा, जो इसे गाना चाहते थे।

  • विपक्ष पर आरोप: उन्होंने ‘इंडी अलायंस’ के सदस्यों पर संसद में ‘वंदे मातरम्’ का गान होने पर बाहर चले जाने का आरोप लगाया।

3. मल्लिकार्जुन खड़गे (कांग्रेस अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष, राज्यसभा)

  • इतिहास से पलटवार: खड़गे ने बीजेपी के वैचारिक पूर्वजों पर ‘अंग्रेजों की नौकरी’ करने का आरोप लगाया, जबकि 1921 में असहयोग आंदोलन के दौरान कांग्रेस के लाखों कार्यकर्ता ‘वंदे मातरम्’ गाते हुए जेल गए थे।

  • नेहरू का बचाव: उन्होंने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ पर 1937 का निर्णय महात्मा गांधी, टैगोर, सुभाष चंद्र बोस और मौलाना आज़ाद सहित सभी बड़े नेताओं का सामूहिक निर्णय था। PM मोदी और शाह नेहरू पर हमला करके इन सभी महान नेताओं का अपमान कर रहे हैं।

  • माफी की मांग: उन्होंने प्रधानमंत्री से आजादी के महापुरुषों का अपमान करने के लिए देश से माफी मांगने की मांग की।

4. प्रियंका गांधी (कांग्रेस नेता)

  • ध्यान भटकाने का आरोप: प्रियंका गांधी ने लोकसभा में सरकार पर हमला करते हुए कहा कि यह चर्चा देश की असलियत छुपाने और वास्तविक मुद्दों (जैसे बेरोजगारी और आर्थिक संकट) से ध्यान भटकाने के लिए कराई जा रही है।

  • नेहरू की ‘गलतियाँ’ सुनें: उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि सरकार को नेहरू की ‘गलतियाँ’ हमेशा के लिए बता देनी चाहिए, ताकि यह मुद्दा खत्म हो।

5. संजय सिंह (आप नेता)

  • दलितों का मुद्दा: राज्यसभा में ‘दलित’ शब्द के उपयोग पर बीजेपी सांसदों की आपत्ति के दौरान, संजय सिंह ने सवाल किया, “क्या दलित, पिछड़े और आदिवासी भारत माता के बच्चे नहीं हैं?” उन्होंने इस बहस को दलितों, पिछड़ों और गरीबों के वास्तविक मुद्दों से जोड़ने की कोशिश की।

 राजनीतिक लाभ और निहितार्थ

‘वंदे मातरम्’ पर यह बहस एक चुनावी ध्रुवीकरण का प्रयास मानी जा रही है, जिसके मुख्य राजनीतिक निहितार्थ ये हैं:

पार्टी संभावित राजनीतिक लाभ/रणनीति
बीजेपी (सत्ता पक्ष) राष्ट्रवाद को मजबूत करना: ‘वंदे मातरम्’ और राष्ट्रीय गौरव को अपनी विचारधारा से जोड़कर हिंदुत्व और राष्ट्रवादी भावनाओं को उभारना। कांग्रेस को ‘तुष्टिकरण’ और ‘देश-विभाजन’ की राजनीति के लिए घेरना, जिससे कोर वोट बैंक मजबूत हो।
कांग्रेस (मुख्य विपक्ष) बीजेपी के राष्ट्रवाद को चुनौती: यह साबित करना कि कांग्रेस का इतिहास राष्ट्रप्रेम और बलिदान का है, जबकि बीजेपी के वैचारिक पूर्वज स्वतंत्रता संग्राम से बाहर थे। बहस को आर्थिक संकट और बेरोजगारी जैसे वास्तविक मुद्दों की ओर मोड़कर सरकार को घेरना।
क्षेत्रीय/अन्य दल (AAP, SP आदि) दलित/सामाजिक न्याय: चर्चा को सामाजिक न्याय और गरीबों के मुद्दों से जोड़कर, यह प्रदर्शित करना कि सरकार धार्मिक/भावनात्मक मुद्दों में उलझकर आम जनता की उपेक्षा कर रही है।

निष्कर्ष: यह चर्चा दोनों प्रमुख दलों के लिए अपनी-अपनी राष्ट्रवाद की परिभाषा को देश के सामने रखने का मंच बन गई है। बीजेपी इसे कांग्रेस के ‘तुष्टिकरण’ और विभाजनकारी इतिहास को उजागर करने के अवसर के रूप में देख रही है, जबकि कांग्रेस इसे सरकार को उसके प्रशासनिक विफलताओं से ध्यान भटकाने के लिए घेर रही है।

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