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सक्ती की आग में सुलगते सवाल: क्या बालको की तरह ‘वेदांता ब्लास्ट’ के गुनहगार भी बच निकलेंगे?

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सक्ती (छत्तीसगढ़) 15 अप्रैल | प्रदेश के औद्योगिक इतिहास में एक और काला अध्याय जुड़ गया है। सक्ती जिले के सिंघीतराई स्थित वेदांता लिमिटेड के पावर प्लांट में मंगलवार दोपहर जो धमाका हुआ, उसने न केवल 16 मजदूरों के प्राण हर लिए, बल्कि छत्तीसगढ़ के औद्योगिक सुरक्षा दावों की भी धज्जियां उड़ा दीं। 30 से अधिक मजदूर अब भी जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या इस नरसंहार के पीछे के असली जिम्मेदार कभी सलाखों के पीछे होंगे?

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जवाबदेही से बचता सिस्टम?

मंगलवार दोपहर 2 बजे जब प्लांट का बॉयलर फटा, तो वह सिर्फ तकनीकी खराबी नहीं थी। आरोप लग रहे हैं कि यह ‘कॉरपोरेट लापरवाही’ का नतीजा है। प्रत्यक्षदर्शियों और श्रमिक संगठनों का कहना है कि सुरक्षा मानकों को ताक पर रखकर काम लिया जा रहा था। प्रशासन ने जांच दल तो गठित कर दिया है, लेकिन इतिहास गवाह है कि ऐसी जांचें अक्सर फाइलों का पेट भरने तक सीमित रह जाती हैं।

बालको हादसे की कड़वी यादें

यह डर बेवजह नहीं है। आज से 15 साल पहले 2009 में बालको (कोरबा) में निर्माणाधीन चिमनी गिरी थी, जिसमें 40 मजदूर मारे गए थे। उस वक्त भी खूब शोर मचा, केस दर्ज हुए और जांच बैठी। लेकिन नतीजा? मुख्य आरोपी चीनी इंजीनियर देश छोड़कर भाग गए और 2025 तक कोर्ट में केवल तारीखें ही चलती रहीं। सजा आज तक किसी को नहीं मिली।

सक्ती की जनता अब पूछ रही है—क्या वेदांता मामले का हश्र भी बालको जैसा ही होगा? क्या रसूखदार कंपनियों के अधिकारी एक बार फिर लंबी कानूनी प्रक्रिया का फायदा उठाकर बच निकलेंगे?

मजदूरों की जान की क्या कोई कीमत नहीं?

प्लांट के बाहर विलाप करते परिजनों की चीखें एक ही सवाल पूछ रही हैं कि आखिर हर बार गरीब मजदूर ही इन औद्योगिक हादसों की बलि क्यों चढ़ता है?

  • निगरानी का अभाव: क्या इंडस्ट्रियल हेल्थ एंड सेफ्टी विभाग (DIHS) के अधिकारियों ने नियमित निरीक्षण किया था?

  • दोषियों पर कार्रवाई: क्या केवल निचले स्तर के सुपरवाइजरों को सस्पेंड कर इतिश्री कर ली जाएगी या टॉप मैनेजमेंट की जवाबदेही तय होगी?

विशेषज्ञों की चेतावनी

विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक निर्माण और संचालन में लापरवाही बरतने वाली कंपनियों पर ‘ब्लैकलिस्ट’ करने जैसी कार्रवाई नहीं होगी, तब तक मजदूर इसी तरह ‘कोयला’ समझकर झोंके जाते रहेंगे।

सक्ती का यह ब्लास्ट प्रशासन के लिए एक लिटमस टेस्ट है। यह देखना होगा कि सरकार पीड़ितों को केवल मुआवजे का ‘मरहम’ लगाकर चुप कराती है या फिर न्याय का एक ऐसा उदाहरण पेश करती है जिससे भविष्य में कोई दूसरा ‘बालको’ या ‘सक्ती’ न दोहराया जाए।


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