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‘देश की सुरक्षा से समझौता नहीं, 148 निर्दोषों की जान लेना आतंकी कृत्य’: ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस कांड में SC ने रद्द की आरोपी की जमानत

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नई दिल्ली: 14 साल पहले हुए देश के सबसे दर्दनाक रेल हादसों में से एक ‘ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस त्रासदी’ को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक और सख्त रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने मामले के एक आरोपी की जमानत रद्द करते हुए स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय सुरक्षा और देश की अखंडता के सामने व्यक्तिगत स्वतंत्रता (अनुच्छेद 21) असीमित नहीं हो सकती। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन.के. सिंह की पीठ ने आरोपी को मिली राहत को यह कहते हुए खत्म कर दिया कि यह केवल एक अपराध नहीं, बल्कि मानवता और राष्ट्र पर सीधा हमला था।

व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर भारी ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’

कलकत्ता हाई कोर्ट द्वारा आरोपी को दी गई जमानत को चुनौती देने वाली सीबीआई की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा, “संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार देता है, लेकिन जब मामला राष्ट्रीय सुरक्षा और यूएपीए (UAPA) जैसे गंभीर आरोपों से जुड़ा हो, तो सहानुभूति के लिए कोई जगह नहीं बचती।” कोर्ट ने माना कि यह हमला महज इत्तेफाक नहीं, बल्कि सरकार पर दबाव बनाने के लिए रची गई एक सोची-समझी साजिश थी।

क्या थी वह काली रात?

9 जून 2010 को पश्चिम बंगाल के झारग्राम क्षेत्र में माओवादी कैडरों ने साजिश के तहत ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस की पटरियां उखाड़ दी थीं।

  • भीषण हादसा: पटरी से उतरी ट्रेन जब सामने से आ रही मालगाड़ी से टकराई, तो मंजर भयावह हो गया।

  • भारी नुकसान: इस आतंकी कृत्य में 148 मासूम यात्रियों ने अपनी जान गंवाई और 170 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हुए।

  • आर्थिक क्षति: हमले के कारण रेलवे और देश की करीब 25 करोड़ रुपये की संपत्ति स्वाहा हो गई थी।

12 साल की कैद भी नहीं बनी जमानत का आधार

आरोपी की ओर से दलील दी गई थी कि वह पिछले 12 वर्षों से जेल में है, इसलिए उसे दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 436A के तहत रिहा किया जाना चाहिए। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जिन अपराधों में आजीवन कारावास या मृत्युदंड तक की सजा का प्रावधान हो, वहां केवल जेल में बिताए गए समय के आधार पर राहत नहीं दी जा सकती।

अदालत का कड़ा संदेश: ‘विरोध के नाम पर बर्बरता मंजूर नहीं’

सुप्रीम कोर्ट ने लोकतांत्रिक अधिकारों और आतंकी कृत्यों के बीच एक स्पष्ट रेखा खींचते हुए कहा कि हर नागरिक को विरोध करने का अधिकार है, लेकिन यह कानून के दायरे में होना चाहिए। रेल की पटरियां उखाड़ना और सैकड़ों लोगों को मौत के मुंह में धकेलना ‘बर्बरता’ है, जिसे किसी भी सभ्य समाज या कानून के तहत स्वीकार नहीं किया जा सकता।

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