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यूपी की सियासत में ‘धर्मयुद्ध’: योगी बनाम शंकराचार्य या शाह बनाम योगी?

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नई दिल्ली/लखनऊ: उत्तर प्रदेश में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बीच छिड़ा विवाद अब धर्म की चौखट लांघकर सत्ता के गलियारों में पहुंच गया है। मौनी अमावस्या पर संगम तट से शुरू हुई यह चिंगारी अब एक बड़े सियासी सवाल में तब्दील हो गई है: क्या यह विवाद सीएम योगी को देश की सर्वोच्च सत्ता की रेस से बाहर करने की कोई सोची-समझी रणनीति है?

विवाद की जड़: संगम पर ‘शिखा’ और सोनीपत में ‘कालनेमि’

प्रयागराज माघ मेले में पुलिस द्वारा शंकराचार्य के शिष्यों और बटुक ब्राह्मणों के साथ की गई कथित बदसलूकी ने इस विवाद को जन्म दिया। आग में घी डालने का काम किया सीएम योगी के उस बयान ने, जिसमें उन्होंने ‘कालनेमि’ का जिक्र किया और विधानसभा में स्पष्ट कहा कि “हर कोई शंकराचार्य नहीं लिख सकता।”

डिप्टी सीएम की अलग राह: अपनों ने ही घेरा?

हैरानी की बात यह है कि जहाँ सीएम योगी कड़ा रुख अख्तियार किए हुए हैं, वहीं प्रदेश के दोनों उपमुख्यमंत्री अलग सुर अलाप रहे हैं:

  • केशव प्रसाद मौर्य: अविमुक्तेश्वरानंद को ‘पूज्य’ बताकर उन्हें मनाने की कोशिश कर रहे हैं।

  • बृजेश पाठक: बटुक ब्राह्मणों को अपने आवास पर बुलाकर सम्मानित कर रहे हैं और पुलिस की कार्रवाई की निंदा कर रहे हैं।

अमित शाह का ‘सनातन’ कार्ड और उत्तराधिकार की जंग

राजनीतिक पंडितों की नजर गृह मंत्री अमित शाह के उस बयान पर टिकी है जिसमें उन्होंने कहा, “सनातन का अपमान करने वाले सत्ता में नहीं लौटते।” सवाल यह है कि क्या यह इशारा योगी आदित्यनाथ की ओर था?

मुख्य कयास:

  1. उत्तराधिकार की रेस: पीएम मोदी के बाद अमित शाह और योगी आदित्यनाथ दो बड़े चेहरे हैं। शाह को ‘रणनीतिकार’ तो योगी को ‘लोकप्रिय जननेता’ माना जाता है।

  2. शिवराज मॉडल: चर्चा है कि 2027 के यूपी चुनाव से पहले या बाद में योगी को ‘शिवराज सिंह चौहान’ की तरह केंद्र में लाकर उनकी राह बदली जा सकती है।

  3. शाह-मौर्य नेक्सस: केशव प्रसाद मौर्य की अमित शाह से नजदीकी जगजाहिर है। केशव का शंकराचार्य के पक्ष में खड़ा होना, योगी के लिए शुभ संकेत नहीं माना जा रहा।

क्रिकेट की तरह राजनीति भी अनिश्चितताओं का खेल है। क्या यह विवाद महज एक प्रशासनिक चूक है या फिर 2029 के लिए बिछाई गई बिसात? इसका जवाब भविष्य की गर्त में है।

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