बेंगलुरु 17 अक्टूबर 2026 Abhimanyu Elephant : मैसूर दशहरे के भव्य जुलूस में जब सोने की अंबारी (स्वर्ण सिंहासन) निकलती है, तो हर आंख जिस गजराज को निहारती है, वह नाम है—’अभिमन्यु’। विशालकाय कद-काठी, अद्भुत अनुशासन और वर्षों के अनुभव के बल पर ‘गजराज अभिमन्यु’ मैसूर दशहरे की आन-बान-शान बन चुके हैं। साल 2020 से लगातार 750 किलोग्राम वजनी स्वर्ण सिंहासन को अपनी पीठ पर उठाने की मुख्य जिम्मेदारी निभाने वाले अभिमन्यु अब अपनी सेवाओं से आधिकारिक रूप से सेवानिवृत्त हो गए हैं।
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शाही परंपरा से लेकर मुश्किल अभियानों के नायक अभिमन्यु की पहचान सिर्फ दशहरे की शाही परंपरा तक सीमित नहीं है। वन विभाग के लिए वह एक साहसी ‘कुमकी हाथी’ के रूप में अग्रणी योद्धा रहे हैं। वर्ष 1977 से वन अभियानों में सक्रिय अभिमन्यु के नाम 300 से अधिक उपद्रवी जंगली हाथियों और 80 से ज्यादा आदमखोर व भटकते बाघों को पकड़ने तथा काबू में करने का अद्भुत रिकॉर्ड दर्ज है।
महावत और वनकर्मियों के लिए भावुक पल
दशकों तक कठोर प्रशिक्षण, अनुशासित सेवा और साथ रहने के कारण अभिमन्यु का अपने महावत व देखभाल करने वाले वनकर्मियों के साथ गहरा आत्मीय रिश्ता बन गया। उनकी सेवानिवृत्ति के अवसर पर वन विभाग के कर्मचारियों की आंखें नम हो गईं। जिस गजराज ने जंगलों के खतरनाक अभियानों से लेकर दशहरे की सांस्कृतिक विरासत को संभाला, अब उसकी जिम्मेदारियां विभाग के अन्य युवा हाथियों को सौंपी जाएंगी।
मथिगोडु हाथी शिविर बनेगा नया ठिकाना
अभिमन्यु अब कर्नाटक के मैसूर क्षेत्र स्थित मथिगोडु हाथी शिविर में आराम का जीवन बिताएंगे। हालांकि जुलाई 2026 में एक नियमित कार्य के दौरान लकड़ी का लट्ठा खिसकाने से उनके बाएं दांत की नोक टूट गई थी, लेकिन पशु चिकित्सकों की देखरेख के बाद वे पूरी तरह स्वस्थ हैं। इसके बाद भी उन्होंने सरगुरु क्षेत्र में बाघ को ट्रैक करने के अभियान में अपनी कुशलता दिखाई थी।
अभिमन्यु की यह सेवानिवृत्ति उनके महान योगदान के बाद जीवन के एक शांतिपूर्ण अध्याय की शुरुआत है। मैसूर दशहरे की गौरवशाली परंपरा और कर्नाटक वन विभाग के इतिहास में गजराज अभिमन्यु का नाम सदैव गर्व से लिया जाएगा।




