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राजस्व कोरबा से और सुविधा कहीं और? रेल प्रबंधन की मनमानी पर सर्वदलीय मोर्चा तैयार, बड़े टकराव के संकेत

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कोरबा 14 अप्रैल। छत्तीसगढ़ की ऊर्जा नगरी और रेलवे को सबसे अधिक राजस्व देने वाले जिलों में शुमार कोरबा अब अपनी ही उपेक्षा से उबल रहा है। ‘कमाऊ पूत’ के साथ हो रहे सौतेले व्यवहार को लेकर शहर के तमाम राजनीतिक दल, सामाजिक संगठन और श्रमिक यूनियन एक मंच पर आ गए हैं। होटल महाराजा में आयोजित कोरबा विकास समिति (रेल) की सर्वदलीय बैठक में रेल प्रबंधन को दो टूक चेतावनी दी गई है कि यदि सेवाओं में सुधार नहीं हुआ, तो पूरा जिला “रेल चक्का जाम” करने को तैयार है।

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प्रमुख मुद्दे: क्यों भड़का है शहर का गुस्सा?

बैठक में वक्ताओं ने उन ज्वलंत समस्याओं को सामने रखा जिससे कोरबा की जनता हर दिन जूझ रही है:

  • कोयला ढुलाई को प्राथमिकता, यात्रियों की बलि: आरोप है कि रेलवे केवल कोयला लदी मालगाड़ियों को रास्ता देने के लिए यात्री ट्रेनों को घंटों आउटर पर खड़ा रखता है। यात्री सुविधाओं के नाम पर जिला शून्य की स्थिति में है।

  • बिलासपुर में ट्रेनों का ‘शॉर्ट टर्मिनेशन’: कोरबा से चलने वाली कई महत्वपूर्ण ट्रेनों को गंतव्य तक लाने के बजाय बिलासपुर में ही समाप्त कर दिया जाता है। इससे बुजुर्गों, मरीजों और छात्रों को भारी असुविधा हो रही है।

  • प्रदूषण का ‘जहर’: स्टेशन पर खड़ी ट्रेनों के भीतर तक कोयले की बारीक धूल जम रही है, जिससे यात्रियों को सांस लेने में दिक्कत और संक्रमण का खतरा बना रहता है।

  • यातायात का गला घोंटते फाटक: बार-बार फाटक बंद होने से शहर की लाइफलाइन थम जाती है, लेकिन ओवरब्रिज या अंडरपास जैसे स्थायी समाधानों पर रेलवे मौन है।


सांसद महंत और सर्वदलीय नेताओं का कड़ा रुख

बैठक में सांसद श्रीमती ज्योत्सना महंत ने तीखे स्वर में कहा कि कोरबा देश के विकास में अपना पसीना और संसाधन झोंक रहा है, लेकिन बदले में उसे सिर्फ धूल और ट्रेनों की लेत-लतीफी मिल रही है।

“कोरबा की जनता अब याचक बनकर नहीं रहेगी। हमने लंबे समय तक शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगें रखीं, लेकिन रेल प्रबंधन इसे हमारी कमजोरी समझ रहा है। अब जवाब सड़क पर उतरकर दिया जाएगा।”

इस बैठक में भाजपा, कांग्रेस, भाकपा और माकपा समेत कई श्रमिक संगठनों के पदाधिकारियों ने दलीय राजनीति से ऊपर उठकर इस मुद्दे पर लड़ने की शपथ ली। नेताओं ने स्पष्ट किया कि यह किसी एक दल की नहीं, बल्कि पूरे कोरबा के आत्मसम्मान की लड़ाई है।


आंदोलन की रणनीति

बैठक के समापन पर रणनीति तैयार की गई कि अगले चरण में रेल महाप्रबंधक (GM) के नाम ज्ञापन सौंपा जाएगा। यदि एक निश्चित समय सीमा के भीतर नई ट्रेनों की शुरुआत और मौजूदा व्यवस्था में सुधार नहीं दिखा, तो जिलाव्यापी आंदोलन और रेल पटरी पर उतरने जैसा बड़ा कदम उठाया जाएगा।


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